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शनिवार, 23 मई 2009

नेकी कर, कुएमे डाल ! ५

इस सखीसे मन करता है, सीधे बात करूँ...एक संवाद, जैसे अपनी बेटीसे करती रहती हूँ...वो सुने ना सुने...

" मेरे बच्चे तुम्हें 'मासी' कहते थे...! तुम्हें कितना अच्छा लगा ये संबोधन, खासकर उस वक्त, जब मैंने इसका अर्थ तुम्हें बतलाया...माँ जैसी...! मराठी भाषा मे एक कहावत है,चाहे माँ मर जाय पर मासी जिए...! मासी को बेहेनकी ऑलाद और बच्चों को अपनी मासी इतनी अधिक प्यारी होती है!

मेरी बिटिया के ब्याह के समय तुम कुछ दिन मेरे पास आके रूकीं... मुझे बेहद अच्छा लगा...उसका ब्याह उसके ससुराल के शेहेरमे होना था...मेरी एक अन्य सहेली और तुम शामकी उडानसे वहाँ पोहोंचने वाले थे..मै, मेरेपती, तथा बेटा और बेटी सुबह की उडानसे पोहोंच गए...

मेरे माता पिता पुनेसे निकले.... हवाई जहाज़ स,उनके साथ मैंने राजू और उसकी पत्नी को भेजा......भाई भाभी, उनके बच्चे और मित्रपरिवार रेलसे निकले..कुछ और नज़दीकी दोस्त-रिश्तेदार भी अलग, अलग उडानों से पोहोंचते रहे....सभीका इंतेज़ाम एकही कैम्पस मे था...लेकिन कैम्पस बोहोत बड़ा था...

तुम जिस सहेलीके साथ थी....तुम्हारे मुताबिक़, वो तुम्हारे ही साथ रहना चाह रही थी..और तुमभी..तुम्हें फ़क़्र था,कि, जोभी तुमसे मिलता है, तुम्हारा ही साथ चाहता है...उसी दिन, जिस दिन तुम दोनों भी पोहोंची, रातमे एक छोटेसे भोजनका आयोजन था...

भोजन स्थलपे तुम्हें मैंने जींस पहेने देखा,तो पूछा,"अरे, ये क्या? जींस क्यों पेहें लीं? तुम्हें तो खूब सजना सँवरना था? "
तुम्हारा उत्तर," अरे बाबा ! इसने( तुमने उस सहेलीकी ओर इंगित करते हुए कहा),मुझे ठीकसे तैयार ही नही होने दिया...बोली, क्या ज़रूरत है...चलो ऐसेही..देर हो रही है॥!"
मैंने कहा," तो क्या..तुमने कहना था, कि, तुम तैयार होना चाहती हो...रुक जाए १० मिनट॥! खैर! आइंदा, कोई तुम्हें टोके,तो ज़रूर कहना,कि, तुम्हें ठीकसे साडी ज़ेवर डालना पसंद है...और वैसाही करना!"

उस सहेलीको मै, सन ८२ स जानती थी...सन ८८ मे उसके पतीका देहांत हो गया था, जोकि, हमारा बेहद क़रीबी दोस्त था...जबकि, ये सच है, तुम्हें उसके छ: साल बाद मिली...लेकिन, हरेक दोस्तकी अपनी एक जगह होती है...ये अधिक प्यारा या दूसरा कम प्यारा ऐसा नही होता...हम कई बातें, किसी एक व्यक्तीसे कह सकते हैं, जो अन्य स नही कह पाते..इसका ये मतलब नही,कि, वो हमें प्यारा नही...

खैर ! ज़ाहिरन, मै बेहद व्यस्त थी...आयोजन हम पती-पत्नीके जिम्मे था...और मेरे पती केवल दोही दिन पहले मुम्बई पधारे थे...विदर्भ( नागपूर) महाराष्ट्र की सर्दियों मे राजधानी होती है.. वे वहाँ थे..आधेसे अधिक औपचारिकताएँ मुझे निभानी थीं...चाहे वो मुम्बई मे हों या कहीँ और..निमन्त्रितों की फेहरिस्त बनाके, कब, किसे, कौन पत्रिका देगा, ये सब बारीकियाँ मुझेही देखनी सोचनी थीं...कोई रह ना जाए...

जोभी हो, मेरे मायकेसे आए, हर व्यक्तीका ख़याल, व्यक्ती गत रूपसे मै नही रख सकती थी ....ये बात नामुमकिन थी..... ...लेकिन, हरेक का रहने-रुकनेका इंतेज़ाम करते समय( जबकि मैंने वो जगह ख़ुद इससे पूर्व नही देखी थी), मैंने ध्यान रखा था, कि, कौन किसके साथ रुकेगा...मतलब किसके कमरे किसके साथ लगे हों...इसलिए,कि, उन्हें अकेला पन महसूस ना हो, और ज़रूरत के समय साथवाला हाज़िर रह सके...सभीने मेरी इस दूरन देशी की सराहना की...

मेससे कब,कौन,किसके साथ, भिन्न भिन्न समारोहों के आयोजन स्थल पे जाएगा...उन कारों के नंबर तक मैंने ३/४ दोस्त रिश्तेदारों के हवाले कर दिए थे...ऐसा न हो,कि, किसीकी किसीके साथ बनती/पटती नही, और उसे ज़बरन, उसी व्यक्तीके साथ आयोजन स्थलपे जाना पड़ जाय!

बिटियाके ससुराल वालेभी हर इंतेज़ाम स खुश थे...उनके मेहमानों कोभी उसी कैम्पस मे ठहराया गया था...उनके आगत स्वागत के लिए हमें हाज़िर रहना ज़रूरी था...!

ब्याह्की पूर्वसंध्याको मंगनी की विधी थी..अगले दिन तडके मुहूर्त था...वैदिक विधी का...दोपेहेरमे भोजन...उसी स्थान पे...उसके बाद, हमें अपनी मेस मे लौट,दुल्हन को तैयार कर, उसके ससुराल, गृह प्रवेशके लिए ले जाना था...खुदभी तैयार होना था....उसके पश्च्यात उनकी ओरसे स्वागत समारोह! गृह प्रवेशके बारेमे, जब मैंने पता किया, तब इत्तेला मिली...उस सम्बंधित इ-मेल मुझे मिलीही नही थी !

गृह प्रवेश के बाद उसकी ससुराल की ओरसे स्वागत समारोह था...जहाँ ब्याह हुआ, उस जगहसे, जहाँ हम रुके थे, एक घंटे का फासला था...और फिर हम जहाँ रुके थे, वहाँ से बिटियाका ससुराल २ घंटों के फासलेपे...और फिर आगे स्वागत समारोह! उसके पश्च्यात वधु वर के रहनेका इंतेज़ाम वापस उसी मेस के एक हिस्सेमे...उस कमरेतक तो मै चाह्केभी पहोंच नही पायी..उसकी साज सज्जा की ज़िम्मेदारी मैंने अन्य किसीपे सौंप दी...!

स्वागत समारोह मे अचानक तुम, बेहद गुस्सेमे, रोते हुए, मेरे पास पोहोंच गयीं..और मेरी उसी सहेलीके बारेमे शिकायत करने लगी..मैंने मज़ाक मे कह दिया,'अरे, छोडोभी ना ! क्यों, ऐसा बचपना कर रही हो..ऐसा कभी कर सकती हूँ मैं?"

तुम्हारी इच्छा थी,कि, मै उस सहेलीको सबके सामने डांट लगा दूँ ! वजेह क्या...ये तो सब बारीकियाँ मुझे बादमे पता चलीं...जब रात मे तुम मेरे कमरेमे आ गयीं और,और उस सहेली के कानों तक पोहोंचे, इसतरह से शिकायत करने लगीं...शिकायत तो तुम्हें मुझसेभी थी,कि, मैंने उसे डांटा नही....!"

क्रमश: