कुछ अरसा हुआ इस बात को...पूरानें मित्र परिवार के घर भोजन के लिए गए थे। उनके यहाँ पोहोंचते ही हमारा परिचय, वहाँ, पहले से ही मौजूद एक जोड़े से कराया गया। उसमे जो पती महोदय थे, मुझ से बोले,"पहचाना मुझे?
"मै: "माफ़ी चाहती हूँ...लेकिन नही पहचाना...! क्या हम मिल चुके हैं पहले? अब जब आप पूछ रहें है, तो लग रहा है, कि, कहीँ आप माणिक बाई के रिश्तेदार तो नही? उनके मायके के तरफ़ से तो यही नाम था...हो सकता है, जब अपनी पढाई के दौरान एक साल मै उनके साथ रही थी, तब हम मिले हों...!"
स्वर्गीय माणिक बाई पटवर्धन, रावसाहेब पटवर्धन की पत्नी। रावसाहेब तथा उनके छोटे भाई, श्री. अच्युत राव पटवर्धन, आज़ादी की जंग के दौरान, राम लक्ष्मण की जोड़ी कहलाया करते थे। ख़ुद रावसाहेब पटवर्धन, अहमदनगर के 'गांधी' कहलाते थे...उनका परिवार मूलत: अहमदनगर का था...इस परिवार से हमारे परिवार का परिचय, मेरे दादा-दादी के ज़मानेसे चला आ रहा था। दोनों परिवार आज़ादी की लड़ाई मे शामिल थे....
मै जब पुणे मे महाविद्यालयीन पढाई के लिए रहने आयी,तो स्वर्गीय रावसाहेब पटवर्धन, मेरे स्थानीय gaurdian थे।जिस साल मैंने दाखिला लिया, उसी साल उनकी मृत्यू हो गयी, जो मुझे हिला के रख गयी। अगले साल हॉस्टल मे प्रवेश लेने से पूर्व, माणिक बाई ने मेरे परिवार से पूछा,कि, क्या, वे लोग मुझे छात्रावास के बदले उनके घर रख सकते हैं? अपने पती की मृत्यू के पश्च्यात वो काफ़ी अकेली पड़ गयीं थीं...उनकी कोई औलाद नही थी।
मेरा महाविद्यालय,उनके घरसे पैदल, ५ मिनटों का रास्ता था।मेरे परिवार को क़तई ऐतराज़ नही था। इसतरह, मै और अन्य दो सहेलियाँ, उनके घर, PG की हैसियत से रहने लगीं।
माणिक बाई का मायका पुणे मे हुआ करता था...भाई का घर तो एकदम क़रीब था।उस शाम, हमारे जो मेज़बान थे , वो रावसाहेब के परिवार से नाता रखते थे/हैं....यजमान, स्वर्गीय रावसाहेब के छोटे भाई के सुपुत्र हैं...जिन्हें मै अपने बचपनसे जानती थी।अस्तु ! इस पार्श्व भूमी के तहत, मैंने उस मेहमान से अपना सवाल कर डाला...!
उत्तर मे वो बोले:" बिल्कुल सही कहा...मै माणिक बाई के भाई का बेटा हूँ...!
"मै: "ओह...! तो आप वही तो नही , जिनके साथ भोजन करते समय हम तीनो सहेलियाँ, किसी बात पे हँसती जा रहीँ थीं...और बाद मे माणिक बाई से खूब डांट भी पड़ी थी...हमारी बद तमीज़ी को लेके..हम आपके ऊपर हँस रहीँ हो, ऐसा आभास हो रहा था...जबकि, ऐसा नही था..बात कुछ औरही थी...! आप अपनी मेडिसिन की पढाई कर रहे थे तब...!"
जवाब मे वो बोले: " बिल्कुल सही...! मुझे याद है...!"
मै: " लेकिन मै हैरान हूँ,कि, आपने इतने सालों बाद मुझे पहचाना...!२० साल से अधिक हो गए...!"
उत्तर:" अजी...आप को कैसे भूलता...! उस दोपहर भोजन करते समय, मुझे लग रहा था,कि, मेरे मुँह पे ज़रूर कुछ काला लगा है...जो आप तीनो इस तरह से हँस रही थी...!"
खैर ! हम लोग जम के बतियाने लगे....भाषा के असमंजस पे होने वाली मज़ेदार घटनायों का विषय चला तो ये जनाब ,जो अब मशहूर अस्थी विशेषग्य बन गए थे, अपनी चंद यादगारें बताने लगे...
डॉक्टर: " मै नर्सिंग कॉलेज मे पढाता था, तब की एक घटना सुनाता हूँ...एक बार, एक विद्यार्थिनी की नोट्स चेक कर रहा था..और येभी कहूँ,कि, ये विद्यार्थी, अंग्रेज़ी शब्दों को देवनागरी मे लिख लेते थे..नोट्स मे एक शब्द पढा,' टंगड़ी प्रेसर'...मेरे समझ मे ना आए,कि, ये टांग दबाने का कौन-सा यंत्र है,जिसके बारे मे मुझे नही पता...!
कौतुहल इतना हुआ,कि, एक नर्स को बुला के मैंने पूछ ही लिया..उसने क़रीब आके नोट्स देखीं, तो बोली, 'सर, ये शब्द 'टंगड़ी प्रेसर' ऐसा नही है..ये है,'टंग डिप्रेसर !' "
आप समझ ही गए होंगे...ये क्या बला होती है...! रोगी का, ख़ास कर बच्चों का गला तपास ते समय, उनका मुँह ठीक से खुलवाना ज़रूरी होता है..पुराने ज़माने मे तो डॉक्टर, गर घर पे रोगी को देखने आते,तो, केवल एक चम्मच का इस्तेमाल किया करते..!हमलोगों का हँस, हँस के बुरा हाल हुआ...और उसके बाद तो कई ऐसी मज़ेदार यादेँ उभरी...शाम कब गुज़र गयी, पता भी न चला..!
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सोमवार, 11 जनवरी 2010
सोमवार, 28 दिसंबर 2009
बोले तू कौनसी बोली ? ४: सहपरिवार ...!
काफ़ी साल हो गए इस घटनाको...बच्चे छोटे थे...हमारे एक मित्र का तबादला किसी अन्य शेहेर मे हो गया। हमारा घर मेहमानों से भरा हुआ था, इसलिए मेरे पतीने उस परिवार को किसी होटल मे भोजन के लिए ले जाने की बात सोची।
एक दिन पूर्व उसके साथ सब तय हो चुका था... पतीने उससे इतना ज़रूर कहा था, कि, निकलने से पहले, शाम ७ बजेके क़रीब वो एकबार फोन कर ले। घरसे होटल दूर था...बच्चे छोटे होने के कारण हमलोग जल्दी वापस भी लौटना चाह रहे थे।
उन दिनों मोबाईल की सुविधा नही थी। शाम ७ बजे से पहलेही हमारी land लाइन डेड हो गयी...! मेरे पती, चूंकी पुलिस मेहेकमे मे कार्यरत थे, उन्हों ने अपने वायरलेस ऑपरेटर को, एक मेसेज देके उस मित्र के पास भेजा," आप लोगों का सहपरिवार इंतज़ार है..."
हमारे घर क़रीब थे। ऑपरेटर पैदल ही गया। कुछ देर बाद लौटा और इनसे बोला," उन्हों ने फिर एकबार पूछा है..उन्हें मेसज ठीक से समझ नही आया..."
हम दोनों ही ज़रा चकित हो गए...मैंने इनसे कहा," आप एक चिट्ठी लिख दें तो बेहतर न होगा?"
"अरे, इतनी-सी बात है...उसमे क्या चिट्ठी लिखनी?"
इतना कह,इन्हों ने फिर एकबार अपनी बात उस ऑपरेटर के आगे दोहरा दी।
ऑपरेटर जाके लौट आया। हमारा फोन तो डेड थाही। तकरीबन ९ बजे उसमे जान आयी...एक हलकी-सी'ट्रिंग" की आवाज़ मुझे सुनाई पड़ी...! मैंने इन्हें झट अपने मित्र को फोन करने के लिए कहा...
इन्हों ने फोन घुमाया," अरे यार! क्या हो गया है तुम लोगों को? हम शाम ७ बजे से इंतज़ार कर रहे हैं...अब ९ बजने आए...! कहाँ रह गए हो? हमसे ज़्यादा तो तुझे जल्दी थी, बच्चों के कारण.....!"
" लेकिन तूने तो कहा था,कि, बस हमही लोग हैं...तूने ये औपचारिकता क्यों कर दी? और लोगों को क्यों बुला लिया?" हमारे मित्र ने कुछ शिकायत के सुर मे कहा पूछा।
"लेकिन तुझे किसने कह दिया कि, और लोगों को आमंत्रित किया है? बस तुम लोग हो और हम चार...! "मेरे पती ने कहा...
"अरे यार ! मैंने तो दो बार पुछवाया, कि, और कौन आनेवाला है, और तू कहता रहा,'सफारी पेहेन के बुलाया है'...अब सफ़ारी सूट तो औपचारिक आयोजनों मे पहना जाता है..मै तो कुरता पजामा पेहेन आनेवाला था...मेरी बीबी अब सफ़ारी पे इस्त्री कर रही है....!"
"अरे भैया , तुझे किसने कहा 'सफ़ारी' पेहेन के आने को....? अब जैसा है वैसा ही आजा..." इनकी आवाज़ शायद कुछ अधिक बुलंद हुई होगी, क्योंकि, उसकी पत्नी ने सुन ली...!
इनके मित्र ने जवाब दिया," यार, अब मेरी बीबी कह रही है, इतनी मुश्किल से तो ये सूट ढूँढा...कहाँ loft पे पडा मिला...अब यही पहनो...उसने इस्त्री भी की है...खैर, आते हैं हमलोग..बस और ५ मिनिट दे दो...!"
मुझे ये सँवाद सुनाई पड़ रहा था, और बात समझ मे आने लगी तो मेरी हँसी छूटती जा रही थी, और इन्हें गुस्सा चढ़ता जा रहा था..!
इन्हों ने ओपरेटर को बुला के डाँटना शुरू किया," कमाल है तुम लोगों की...इतना सीधा मेसेज समझ नही सकते..वायरलेस पे क्या समझते होगे? मै "सेह्परिवार" कहता चला जा रहा था, और तुम "सफ़ारी" सुन रहे थे?"
अब ये 'उच्चारण 'का भेद मुझे समझ मे आ रहा था... मराठी मे "सह परिवार" इसतरह उच्चारण होता है, जबकि, ये 'सेप्ररी वार "...इस तरह से उच्चारण कर रहे थे...और वो लड़का उसे 'सफ़ारी" सुन रहा था...!
मैंने अपने पती का गुस्सा शांत करने के ख़ातिर कहा," आप अपने आपको चंद रोज़/माह आगे कर के देखो...आपको ख़ुद इस बात पे हँसी आयेगी...तो अभी ही क्यों न हँस लें?"
खैर! मेरा वो प्रयास तो असफल रहा...लेकिन, ये सच है,कि, चंद रोज़ बाद इसी बात को याद कर हम सब खूब हँस लेते थे...जब कभी अपने अन्य दोस्तों को बताते....बडाही मज़ा लेके बताते...अब तो जब सफ़ारी की बात निकलती है, हम उसे 'सह परिवार' कहते हैं, और जब 'सह परिवार' की बात होती है तो उसे 'सफारी' कह लेते हैं....ख़ास कर मै ख़ुद!
एक दिन पूर्व उसके साथ सब तय हो चुका था... पतीने उससे इतना ज़रूर कहा था, कि, निकलने से पहले, शाम ७ बजेके क़रीब वो एकबार फोन कर ले। घरसे होटल दूर था...बच्चे छोटे होने के कारण हमलोग जल्दी वापस भी लौटना चाह रहे थे।
उन दिनों मोबाईल की सुविधा नही थी। शाम ७ बजे से पहलेही हमारी land लाइन डेड हो गयी...! मेरे पती, चूंकी पुलिस मेहेकमे मे कार्यरत थे, उन्हों ने अपने वायरलेस ऑपरेटर को, एक मेसेज देके उस मित्र के पास भेजा," आप लोगों का सहपरिवार इंतज़ार है..."
हमारे घर क़रीब थे। ऑपरेटर पैदल ही गया। कुछ देर बाद लौटा और इनसे बोला," उन्हों ने फिर एकबार पूछा है..उन्हें मेसज ठीक से समझ नही आया..."
हम दोनों ही ज़रा चकित हो गए...मैंने इनसे कहा," आप एक चिट्ठी लिख दें तो बेहतर न होगा?"
"अरे, इतनी-सी बात है...उसमे क्या चिट्ठी लिखनी?"
इतना कह,इन्हों ने फिर एकबार अपनी बात उस ऑपरेटर के आगे दोहरा दी।
ऑपरेटर जाके लौट आया। हमारा फोन तो डेड थाही। तकरीबन ९ बजे उसमे जान आयी...एक हलकी-सी'ट्रिंग" की आवाज़ मुझे सुनाई पड़ी...! मैंने इन्हें झट अपने मित्र को फोन करने के लिए कहा...
इन्हों ने फोन घुमाया," अरे यार! क्या हो गया है तुम लोगों को? हम शाम ७ बजे से इंतज़ार कर रहे हैं...अब ९ बजने आए...! कहाँ रह गए हो? हमसे ज़्यादा तो तुझे जल्दी थी, बच्चों के कारण.....!"
" लेकिन तूने तो कहा था,कि, बस हमही लोग हैं...तूने ये औपचारिकता क्यों कर दी? और लोगों को क्यों बुला लिया?" हमारे मित्र ने कुछ शिकायत के सुर मे कहा पूछा।
"लेकिन तुझे किसने कह दिया कि, और लोगों को आमंत्रित किया है? बस तुम लोग हो और हम चार...! "मेरे पती ने कहा...
"अरे यार ! मैंने तो दो बार पुछवाया, कि, और कौन आनेवाला है, और तू कहता रहा,'सफारी पेहेन के बुलाया है'...अब सफ़ारी सूट तो औपचारिक आयोजनों मे पहना जाता है..मै तो कुरता पजामा पेहेन आनेवाला था...मेरी बीबी अब सफ़ारी पे इस्त्री कर रही है....!"
"अरे भैया , तुझे किसने कहा 'सफ़ारी' पेहेन के आने को....? अब जैसा है वैसा ही आजा..." इनकी आवाज़ शायद कुछ अधिक बुलंद हुई होगी, क्योंकि, उसकी पत्नी ने सुन ली...!
इनके मित्र ने जवाब दिया," यार, अब मेरी बीबी कह रही है, इतनी मुश्किल से तो ये सूट ढूँढा...कहाँ loft पे पडा मिला...अब यही पहनो...उसने इस्त्री भी की है...खैर, आते हैं हमलोग..बस और ५ मिनिट दे दो...!"
मुझे ये सँवाद सुनाई पड़ रहा था, और बात समझ मे आने लगी तो मेरी हँसी छूटती जा रही थी, और इन्हें गुस्सा चढ़ता जा रहा था..!
इन्हों ने ओपरेटर को बुला के डाँटना शुरू किया," कमाल है तुम लोगों की...इतना सीधा मेसेज समझ नही सकते..वायरलेस पे क्या समझते होगे? मै "सेह्परिवार" कहता चला जा रहा था, और तुम "सफ़ारी" सुन रहे थे?"
अब ये 'उच्चारण 'का भेद मुझे समझ मे आ रहा था... मराठी मे "सह परिवार" इसतरह उच्चारण होता है, जबकि, ये 'सेप्ररी वार "...इस तरह से उच्चारण कर रहे थे...और वो लड़का उसे 'सफ़ारी" सुन रहा था...!
मैंने अपने पती का गुस्सा शांत करने के ख़ातिर कहा," आप अपने आपको चंद रोज़/माह आगे कर के देखो...आपको ख़ुद इस बात पे हँसी आयेगी...तो अभी ही क्यों न हँस लें?"
खैर! मेरा वो प्रयास तो असफल रहा...लेकिन, ये सच है,कि, चंद रोज़ बाद इसी बात को याद कर हम सब खूब हँस लेते थे...जब कभी अपने अन्य दोस्तों को बताते....बडाही मज़ा लेके बताते...अब तो जब सफ़ारी की बात निकलती है, हम उसे 'सह परिवार' कहते हैं, और जब 'सह परिवार' की बात होती है तो उसे 'सफारी' कह लेते हैं....ख़ास कर मै ख़ुद!
मंगलवार, 22 दिसंबर 2009
बोले तू कौनसी बोली ! ३
४/५ साल हो गए इस घटनाको...मै अपनी किसी सहेलीके घर चंद रोज़ बिताने गयी थी। सुबह नहा धोके ,अपने कमरेसे बाहर निकली तो देखा, उसकी सासुजी, खाने के मेज़ पे बैठ ,कुछ सब्ज़ी आदि साफ़ कर रही थीं.......१२ लोग बैठ सकें, इतना बड़ा मेज़ था...बैठक, खानेका मेज़ और रसोई, ये सब खुलाही था...
मै उनके सामने वाली कुर्सी पे जा बैठी...तबतक तो उन्हों ने सब्ज़ी साफ़ कर,आगेसे थाली हटा दी...मेरे आगे अखबार खिसका दिए और, फ़ोन बजा तो उसपे बात करने लगीं....
उसी दिनकी पूर्व संध्या को, मै मेरी अन्य एक सहीली के घर गयी थी...ये सहेली उस शेहेर के सिविल अस्पताल मे डॉक्टर थी। उसने बडीही दर्द नाक घटना बयान की...और उस घटना को लेके बेहद उद्विग्न भी थी...मुझसे बोली,
" कल मै रात की ड्यूटी पे थी....कुछ १० बजेके दौरान ,एक छोटी लडकी अस्पताल मे आयी...बिल्कुल अकेली...अच्छा हुआ,कि, मै उसे आपात कालीन विभाग के एकदम सामने खडी मिल गयी...उसकी टांगों परसे खून की धार बह रही थी....उम्र होगी ११ या १२ सालकी...
"मै उसके पास दौड़ी और उसे लेके वार्ड मे गयी...नर्स को बुलाया और उससे पूछ ताछ शुरू कर दी...उसके बयान से पता चला कि, उसपे सामूहिक बलात्कार हुआ था...जो उसे ख़ुद नही पता था...उसे समझ नही आ रहा था,कि, उन चंद लोगों ने उसके साथ जो किया,वो क्यों किया...इतनी भोली थी.....!अपने चाचा के घर गयी थी...रास्ता खेतमे से गुज़रता था...पढनेके लिए, अपने मामा और नानीके साथ शेहेर मे रहती थी...शाम ६ बजे के करीब लौट रही थी..."उस" घटना के बाद शायद कुछ घंटे बेहोश हो गयी...जब उसे होश आया तो सीधे हिम्मत कर अस्पताल पोहोंची....नानी के घरभी नही गयी....उसे IV भी चढाने लगी तो ज़रा-सा भी डरी नही...
मै जानती थी,कि,ये पोलिस केस है...अब इत्तेफाक से मेरे पती यहाँ पोलिस विभाग मे हैं,तो, मैंने उसकी ट्रीटमेंट शुरू करनेमे एक पलभी देर नही की...
"वैसेभी, हरेक डॉक्टर को प्राथमिक चिकित्चा के आधार पे ट्रीटमेंट शुरू करही देनी चाहिए...बाद मे पोलिस को इत्तेला कर सकते हैं..मैंने अपने पती को तो इत्तेला करही दी...लेकिन, अस्पताल मे भी पुलिस तैनात होती ही है...
वहाँ पे चंद मीडिया के नुमाइंदे भी थे..अपने साथ कैमरे लिए हुए...!
"यक़ीन कर सकती हो इस बातका, कि, उतनी गंभीर हालात मे जहाँ उस लडकी को खून चढाने की ज़रूरत थी...वो किसी भी पल shock मे जा सकती थी..मैंने ओपरेशन थिएटर तैयार करनेकी सूचना दी थी...उसे टाँके लगाने थे...और करीब ३० टांकें लगे...इन नुमाइंदों को उसका साक्षात् कार लेनेकी, उसकी फोटो खींचने की पड़ी थी...?
नर्स और वार्ड बॉय को धक्का देके..... पुलिस कांस्टेबल को भी उन ३/४ नुमाइंदों ने धक्का मार दिया..., उसके पास पोहोंच ने की कोशिश मे थे....! वो तो मैंने चंडिका का अवतार धारण कर लिया...उस बच्ची को दूसरे वार्ड मे ले गयी...स्ट्रेचर पे डाला,तो उसके मुँह पे चद्दर उढ़ा दी...वरना तो इसकी फोटो खिंच जानी थी ...!"
इतना बता के फिर उसने बाकी घटना का ब्योरा मुझे सुनाया...मै भी बेहद उद्विग्न हो गयी..कैसे दरिन्दे होते हैं...और हम तो जानवरों को बेकार बदनाम करते हैं...! जानवर तो कहीँ बेहतर...! पर मुझे और अधिक संताप आ रहा था, उन कैमरा लिए नुमाइंदों पे...! ज़रा-सी भी संवेदन शीलता नही इन लोगों मे? सिर्फ़ अपने अखबारों मे सनसनी खेज़ ख़बर छप जाय...अपनी तारीफ़ हो जाय, कि, क्या काम कर दिखाया ! ऐसी ख़बर तस्वीर के साथ ले आए...! सच पूछो तो इस किस्म की संवेदन हीनता का मेरा भी ये पहला अनुभव नही था...जोभी हो!
मै जिनके घर रुकी थी, रात को वहाँ लौटी तो मेरे मनमे ये सारी बातें घूम रही थीं...सुबह मेज़ पेसे जब अखबार उठाये,तो बंगाल मे घटी, और मशहूर हुई एक घटना का ब्योरा पढ़ने लगी...उस "मशहूर" हुए बलात्कारी को सज़ा सुनाई गयी थी, और चंद लोगों ने उसपे "दया" दिखने की गुहार करते हुए मोर्चा निकाला था...ये ख़बर भी साथ, साथ छपी थी...! दिमाग़ चकरा रहा था....!
इतनेमे मेरी मेज़बान महिला फोन पे बात ख़त्म कर मेरे आगे आके बैठ गयीं और बतियाने लगीं," आजकल रेपिंग भी एक कला बन गयी है..."
मैंने दंग होके उनकी ओर देखा...! क्या मेरे कानों ने सही सुना ?? मेरी शक्ल पे हैरानी देख वो आगे बोली," हाँ! सही कह रही हूँ...हमलोग तो लड़कियों को ये हुनर सिखाते हैं....!"
कहते,कहते वो, अपनी कुर्सी के पीछे मुड़ के बोलीं ," अरे ओ राधा...ठीक से रेप कर...अरे किसन...तुझे मैंने रेप करना सिखाया था ना...अरे ,तू मेरा मुँह क्या देख रहा है...सिखा ना राधा को...करके दिखा उसको...राधा, सीख ज़रा उससे...ठीकसे देख, फिर रेप कर...!"
मेरी तरफ़ मुडके बोली," कितना महँगा पेपर बरबाद कर दिया...! ज़रा मेरा ध्यान हटा और सब ग़लत रेप करके रख दिया...!"
अब मेरी समझमे आने लगा कि, उस बड़ी-सी मेज़ के कुछ परे, एक कोनेमे,( जो मुझे नज़र नही आ रहा था, और पानी चढाने की मोटर चल रही थी, तो कागज़ की आवाज़ भी सुनाई नही दे रही थी), उनके २ /३ नौकर चाकर , कुछ तोहफे कागज़ मे लपेट रहे थे!
उनके पोते का जनम दिन था ! जनम दिन पे आनेवाले "छोटे" मेहमानों के खातिर, अपने साथ घर ले जानेके लिए तोहपे, "रैप" किए जा रहे थे! ! इन मेज़बान महिला का उच्चारण "wrap"के बदले "रेप" ऐसा हो रहा था....और मै अखबार मे छपी ख़बर भी पढ़ रही थी....तथा,पूर्व संध्या को सुनी "उस" ख़बर का ब्योरा मनमे था...उस घटना के बारेमे ख़बर भी वहाँ के लोकल अखबार मे छपी थी..मैंने उसे भी पढा था..ग़नीमत थी,कि, लडकी का नाम पता नही दिया था...! ज़ाहिर था, उन्हें मिलाही नही था...!
लेकिन चंद पल जो मै हैरान रह गयी, उसका कारण केवल मेरे दिमाग़ का" अन्य जगह" मौजूद होना था...वरना, मुझे इन उच्चारणों की आदत भी थी.....!
क्रमश:
मै उनके सामने वाली कुर्सी पे जा बैठी...तबतक तो उन्हों ने सब्ज़ी साफ़ कर,आगेसे थाली हटा दी...मेरे आगे अखबार खिसका दिए और, फ़ोन बजा तो उसपे बात करने लगीं....
उसी दिनकी पूर्व संध्या को, मै मेरी अन्य एक सहीली के घर गयी थी...ये सहेली उस शेहेर के सिविल अस्पताल मे डॉक्टर थी। उसने बडीही दर्द नाक घटना बयान की...और उस घटना को लेके बेहद उद्विग्न भी थी...मुझसे बोली,
" कल मै रात की ड्यूटी पे थी....कुछ १० बजेके दौरान ,एक छोटी लडकी अस्पताल मे आयी...बिल्कुल अकेली...अच्छा हुआ,कि, मै उसे आपात कालीन विभाग के एकदम सामने खडी मिल गयी...उसकी टांगों परसे खून की धार बह रही थी....उम्र होगी ११ या १२ सालकी...
"मै उसके पास दौड़ी और उसे लेके वार्ड मे गयी...नर्स को बुलाया और उससे पूछ ताछ शुरू कर दी...उसके बयान से पता चला कि, उसपे सामूहिक बलात्कार हुआ था...जो उसे ख़ुद नही पता था...उसे समझ नही आ रहा था,कि, उन चंद लोगों ने उसके साथ जो किया,वो क्यों किया...इतनी भोली थी.....!अपने चाचा के घर गयी थी...रास्ता खेतमे से गुज़रता था...पढनेके लिए, अपने मामा और नानीके साथ शेहेर मे रहती थी...शाम ६ बजे के करीब लौट रही थी..."उस" घटना के बाद शायद कुछ घंटे बेहोश हो गयी...जब उसे होश आया तो सीधे हिम्मत कर अस्पताल पोहोंची....नानी के घरभी नही गयी....उसे IV भी चढाने लगी तो ज़रा-सा भी डरी नही...
मै जानती थी,कि,ये पोलिस केस है...अब इत्तेफाक से मेरे पती यहाँ पोलिस विभाग मे हैं,तो, मैंने उसकी ट्रीटमेंट शुरू करनेमे एक पलभी देर नही की...
"वैसेभी, हरेक डॉक्टर को प्राथमिक चिकित्चा के आधार पे ट्रीटमेंट शुरू करही देनी चाहिए...बाद मे पोलिस को इत्तेला कर सकते हैं..मैंने अपने पती को तो इत्तेला करही दी...लेकिन, अस्पताल मे भी पुलिस तैनात होती ही है...
वहाँ पे चंद मीडिया के नुमाइंदे भी थे..अपने साथ कैमरे लिए हुए...!
"यक़ीन कर सकती हो इस बातका, कि, उतनी गंभीर हालात मे जहाँ उस लडकी को खून चढाने की ज़रूरत थी...वो किसी भी पल shock मे जा सकती थी..मैंने ओपरेशन थिएटर तैयार करनेकी सूचना दी थी...उसे टाँके लगाने थे...और करीब ३० टांकें लगे...इन नुमाइंदों को उसका साक्षात् कार लेनेकी, उसकी फोटो खींचने की पड़ी थी...?
नर्स और वार्ड बॉय को धक्का देके..... पुलिस कांस्टेबल को भी उन ३/४ नुमाइंदों ने धक्का मार दिया..., उसके पास पोहोंच ने की कोशिश मे थे....! वो तो मैंने चंडिका का अवतार धारण कर लिया...उस बच्ची को दूसरे वार्ड मे ले गयी...स्ट्रेचर पे डाला,तो उसके मुँह पे चद्दर उढ़ा दी...वरना तो इसकी फोटो खिंच जानी थी ...!"
इतना बता के फिर उसने बाकी घटना का ब्योरा मुझे सुनाया...मै भी बेहद उद्विग्न हो गयी..कैसे दरिन्दे होते हैं...और हम तो जानवरों को बेकार बदनाम करते हैं...! जानवर तो कहीँ बेहतर...! पर मुझे और अधिक संताप आ रहा था, उन कैमरा लिए नुमाइंदों पे...! ज़रा-सी भी संवेदन शीलता नही इन लोगों मे? सिर्फ़ अपने अखबारों मे सनसनी खेज़ ख़बर छप जाय...अपनी तारीफ़ हो जाय, कि, क्या काम कर दिखाया ! ऐसी ख़बर तस्वीर के साथ ले आए...! सच पूछो तो इस किस्म की संवेदन हीनता का मेरा भी ये पहला अनुभव नही था...जोभी हो!
मै जिनके घर रुकी थी, रात को वहाँ लौटी तो मेरे मनमे ये सारी बातें घूम रही थीं...सुबह मेज़ पेसे जब अखबार उठाये,तो बंगाल मे घटी, और मशहूर हुई एक घटना का ब्योरा पढ़ने लगी...उस "मशहूर" हुए बलात्कारी को सज़ा सुनाई गयी थी, और चंद लोगों ने उसपे "दया" दिखने की गुहार करते हुए मोर्चा निकाला था...ये ख़बर भी साथ, साथ छपी थी...! दिमाग़ चकरा रहा था....!
इतनेमे मेरी मेज़बान महिला फोन पे बात ख़त्म कर मेरे आगे आके बैठ गयीं और बतियाने लगीं," आजकल रेपिंग भी एक कला बन गयी है..."
मैंने दंग होके उनकी ओर देखा...! क्या मेरे कानों ने सही सुना ?? मेरी शक्ल पे हैरानी देख वो आगे बोली," हाँ! सही कह रही हूँ...हमलोग तो लड़कियों को ये हुनर सिखाते हैं....!"
कहते,कहते वो, अपनी कुर्सी के पीछे मुड़ के बोलीं ," अरे ओ राधा...ठीक से रेप कर...अरे किसन...तुझे मैंने रेप करना सिखाया था ना...अरे ,तू मेरा मुँह क्या देख रहा है...सिखा ना राधा को...करके दिखा उसको...राधा, सीख ज़रा उससे...ठीकसे देख, फिर रेप कर...!"
मेरी तरफ़ मुडके बोली," कितना महँगा पेपर बरबाद कर दिया...! ज़रा मेरा ध्यान हटा और सब ग़लत रेप करके रख दिया...!"
अब मेरी समझमे आने लगा कि, उस बड़ी-सी मेज़ के कुछ परे, एक कोनेमे,( जो मुझे नज़र नही आ रहा था, और पानी चढाने की मोटर चल रही थी, तो कागज़ की आवाज़ भी सुनाई नही दे रही थी), उनके २ /३ नौकर चाकर , कुछ तोहफे कागज़ मे लपेट रहे थे!
उनके पोते का जनम दिन था ! जनम दिन पे आनेवाले "छोटे" मेहमानों के खातिर, अपने साथ घर ले जानेके लिए तोहपे, "रैप" किए जा रहे थे! ! इन मेज़बान महिला का उच्चारण "wrap"के बदले "रेप" ऐसा हो रहा था....और मै अखबार मे छपी ख़बर भी पढ़ रही थी....तथा,पूर्व संध्या को सुनी "उस" ख़बर का ब्योरा मनमे था...उस घटना के बारेमे ख़बर भी वहाँ के लोकल अखबार मे छपी थी..मैंने उसे भी पढा था..ग़नीमत थी,कि, लडकी का नाम पता नही दिया था...! ज़ाहिर था, उन्हें मिलाही नही था...!
लेकिन चंद पल जो मै हैरान रह गयी, उसका कारण केवल मेरे दिमाग़ का" अन्य जगह" मौजूद होना था...वरना, मुझे इन उच्चारणों की आदत भी थी.....!
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