बुधवार, 1 जुलाई 2009

बोले तू कौनसी बोली ? ६

अपने बचपन की एक यादगार लिखने जा रही हूँ...! या तो रेडियो सुना करते थे हम लोग या रेकॉर्ड्स......हँडल घुमा के चावी भरना और "his master's voice" के ब्रांड वाले ग्रामोफोन पे गीत सुनना...

एक रोज़ मैंने अपनी माँ से सवाल किया,
"अम्मा ! अपने कुए के पास कोई जल गया?"

अम्मा: " क्या? किसने कहा तुझसे...?कोई नही जला...! " मेरी बात सुनके, ज़ाहिरन, अम्मा काफ़ी हैरान हुईं !
मै : "तो फिर वो रेडियो पे क्यों ऐसा गा रहे हैं.....वो दोनों?"
अम्मा: " रेडियो पे? क्या गा रहे हैं?" अम्मा ने रेडियो की आवाज़ पे गौर किया...और हँसने लगीं...!

बात ही कुछ ऐसी थी...उस वक़्त मुझे बड़ा बुरा लगा,कि, मै इतनी संजीदगी से सवाल कर रही हूँ, और माँ हँस रही हैं...!
हमारे घर के क़रीब एक कुआ मेरे दादा ने खुदवाया था।उस कुए का पानी रेहेट से भर के घर मे इस्तेमाल होता था... उस कुए की तरफ़ जाने वाले रास्ते की शुरू मे माँ ने एक मंडवा बनाया था...उसपे चमेली की बेल चढी हुई थी... अब तो समझने वाले समझ ही गए होंगे, कि, मैंने कौनसा गीत सुना होगा और ये सवाल किया होगा...!
गीत था," दो बदन प्यार की आग मे जल गए, एक चमेली के मंडवे तले..."!

अम्मा: " अरे बच्चे...! ये तो गाना है...! "
मै: " लेकिन अगर उस मंडवे के नीचे कोई नही जला तो, दो बदन जल गए ऐसा क्यों गा रहे हैं, वो दोनों?"
अम्मा: "उफ़ ! अब मै तुझे कैसे समझाऊँ...! अरे बाबा, वो कुछ सच मे थोड़े ही जले...तू नही समझेगी..."
मै:" प्यार की आग, ऐसा क्यों गा रहे हैं? ये आग अपने लकडी के चूल्हेकी आग से अलग होती है ? उसमे जलने से मर नही जाते? और जलने पर तो तकलीफ़ होती है..है ना? मेरा लालटेन से हाथ जला था, तो मै तो कितना रोई थी... तो ये दोनों रो क्यों नही रहे...? गा क्यों रहे हैं? इनको तकलीफ नही हुई ? डॉक्टर के पास नही जाना पडा? मुझे तो डॉक्टर के पास ले गए थे...इनको इनकी माँ डॉक्टर के पास क्यों नही ले जा रही...? "

मेरी उम्र शायद ५/६ साल की होगी तब...लेकिन, ये संभाषण तथा सवालों की बौछार मुझे आज तलक याद है...
कुछ दिन पूर्व, अपने भाई से बतियाते हुए ये बात निकली तो उसने कहा,
" लेकिन आपको इतने बचपनमे 'मंडवे' का मतलब पता था? मुझे तो बरसों 'मंडवा' किस बला को कहते हैं, यही नही पता था...!"

कुछ ही साल पूर्व की एक बात याद आ रही है...एक ग़ज़लों-गीतों की महफिल मे जाना हुआ...गानेवाली हस्ती काफ़ी मशहूर थी ...मेरे कानों पे चंद अल्फाज़ पड़े,तो मैंने अपने साथ बैठी सहेली से पूछा," ये क्या गा रहा है...? गीत के बोल तुझे ठीक से सुनायी दे रहे हैं?"
सहेली: "हाँ..! तुझे नही दे रहे?"
मै :" बता तो क्या सुनाई दे रहे हैं..."
हम दोनों की बेहद धीमी आवाज़ मे खुसर पुसर हो रही थी...
सहेली:" ' प्यार परबत तो नही है मेरा लेकिन...' ये मुखडा है..."
मै :" क्या बात करती है...? ऐसा गा रहा है...? अरे ये तो कितने सालों तक मै समझती थी...एक दिन गीत के अल्फ़ाज़ बड़े ध्यान से सुने तो समझी कि, सही अल्फ़ाज़ क्या हैं...! "
सहेली :" तो सही अल्फ़ाज़ क्या हैं...?" मोह्तरेमा काफ़ी हैरान हुई...!

मै :" 'प्यार पर बस तो नही है मेरा लेकिन..' गीत का मुखड़ा इस तरह से है...! मेरा तो ठीक है..मै समझती थी, कि, प्यार पर्वत जितना महान नही है, फिरभी...प्यार करुँ या ना करुँ, इस तरह से कुछ मतलब होगा..लेकिन ये महाशय तो पेशेवर गायक हैं...! "
सहेली :" अरे बाबा...मै तो आजतक 'परबत ' ही समझती चली आ रही थी...!"

क्रमश:

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छा लगा पढ़कर, टिप्पणी बाद में करता हूं।

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  2. आपके भोले पन पर और आपकी सखी की नादानी पर खूब हंसी आयी...लिखती रहिये...
    नीरज

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  3. वाह क्या खूब कहा किस्से कितने हिस्से में तुहारे है
    फूल यादों के खिजाओं में बडे अनमोल सहारे है

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  4. हा हा बिलकुल सही कई गानों के बोल मुझे भी बचपन में सही समझ नहीं आते थे !! जैसे मन तडपत हरी दर्शन को आज विनती करत मुरख औलाद !! लेकिन वो है विनती करत हु रखियो लाज! हा... हा... हा..

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  5. Murariji,
    " moorakh aulaad"...aapne to barbas hansaa diya..!
    Apnehee comment box me jawab de rahee hun, kyon ki, any pathak doston ko sandarbh samajh me aayegaa!!
    Yebhee khoob rahee...!

    "Upkaar" kaa geet... Manaa De ka gayaa( qasme waade pyaar wafaa),jisme ek pankyiko chand saal poorv, aadhee neend me, Vividh bharati pe suna aur sahee alfaaz samajhee...!

    "Ho gamkee haar saamne tere...",mai istarah se samajhtee thee...pata tha, ki, ye galat hee hai, lekin sahee neend me suna aur samajhee.."hogaa maseeha saamne tere.."

    Aapki yaad yahan sanjhaa karne ke liye tahe dilse shukriya!

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  6. शमा जी,

    आपके लेख ने तो कई ऐसे गीत याद दिला दिए और बिना मुस्कुराए हम रह नहीं पाए,

    अपनी बात कहूँ दो ऐसे गाने हैं जिन्हें सुन कर आज भी बे-साख्ता हंसती हूँ :

    तू जहाँ-जहाँ चलेगा मेरा 'साया' साथ होगा, अब हमें उस उम्र में क्या पता 'साया' क्या है, वैसे भी हमारे यहाँ 'पेटीकोट' को साया कहते हैं अब आप समझ सकती हैं कि मेरा छोटा सा दीमाग कितना चिंतित होता होगा यह सुन कर

    मैं तो हर मोड़ पर तुमको दूंगा 'सदा', मुझे उस वक्त 'सदा' का एक ही मतलब मालूम था 'हमेशा' अब मैं परेशां हो जाती थी कि यह आदमी हर मोड़ पर कुछ ना कुछ देगा, मैं परेशान हो जाती थी.....

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  7. uf ! Ye "peticoat" walee baat behad mazedaar hai...aur aapka pareshan hona bhee...!
    Ab to ye wala matlab,phone karke apnee bahan ko batanaa hee padeaga...

    Bachpan kee masoomiyat bhee kya cheez hotee hai..!
    Apnee rishe kee ek bua ko, suna," ladke seetee bajate hain.."...mai suntee rahee...phir sabke saamne sawal kiya," kya wo sab aake kaan me seetee bajate the?"

    Saare ke saare zor se hans pade...aur mujhe barson bada apmanit laga aur achambhit bhee rahee,ki, gar koyi inke kaan me seetee nahee bajata,to kya dikkat hai?

    Ab to aap," kyon hota hai aisa",ye malika (aajtak yahan tak pe hee) zaroor padhen...kramank ko yaad anhee kadee kaa...lekin, jab aap padhengee,to aapko pata chalega, mai apnee 'kis'pareshanee kee baat kar rahee hun!!
    Aur zaroor batayen,ki, aapne ye pahelee boojhee ya nahee...tab kahungee,ki, ye rahee sachhee sahelee...!
    Waise, aapke saath phone pe baat karnekaa bada man ho raha hai..sach me..!

    Meree ek sahelee ko ye mugaalta tha, ki, petticoat ke saath,kisee mard kaa pajama sukha diya jay to jiska petticoat hota hai, use bachha ho jata hai..!

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  8. bhut aannd aagya aapke bholepan par sach bataye aapko padhkar hmko bhi apni bhut sari bevkufiya yad aa rhi hai .ak hai pitaji ki baithak me ak chota shisha lga rhta tha ,jise vo hu uoyog me late the kyoki ham bhno ko baithk me jyada baithne ki ijajt nhi thi ak din pitaji co lleggye the (PROFESAR )hmne socha abhi babuji ka priyad chal rha hoga .us samy umr 14 ya 15 sal thi bs shishe me dekhakar gana shuru mithhu miya aj mai jvan ho gai hu .....itne me achnak babuji aa gye .bs sovh lijiye kya hua hoga ?shisha to utar hi gya jbse .

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  9. शोभना जी , जवाब यहाँ भी देती हूँ , वरना आपके ब्लॉग पे सन्दर्भ नही मिलेगा ...! वाक़ई , ऐसी कितनी यादगारें हैं , मेरी और बाद मे मेरे बच्चों की जिन्हें शब्द बद्ध किया है ..और ढेरों जिन्हें अभी तक नही किया ...
    आपका संस्मरण पढ़, एक ओर हँसी आयी, दूसरी ओर आँखों मे नमी...!'बड़े' होनेकी प्रक्रिया मे हम क्या,क्या गवाँ देते हैं....!

    आप गर ," आँखें थक ना जाए ", या " जा , उड़ जारे पँछी ',आदि संस्मरण पढ़ें तो आपको ज़रूर अच्छा लगेगा ...
    इसे आपके ब्लॉग पे भी कॉपी कर दूँगी ...बोहोत बोहोत शुक्रिया ..!

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