बुधवार, 8 अप्रैल 2009

ये कहाँ आ गए हम ?३

इन्तेज़ारकी घडियाँ ख़त्म हुई...तक़रीबन साथ, साथ ही , निम्मी तथा उसका परिवार और वंदन, मेरे घर पोहोंच गए....!

मै निम्मीकी सहेली थी...उसके सास ससुरके लिए, मैभी उनकी बेटीही थी...जब भी उन लोगोंसे मिली, उन्हों ने उसी प्यार और अपनेपन से मुझे गले लगाया था....आजभी....मेरे बच्चों को अपनेही पोते पोती माना....या यूँ कहेँ, नातिन माना.....जोभी हो, उनके प्यारमे बेहद निश्चलता थी.....कोई दिखावा नही, कोई बनावट नही....ऐसे इंसानों के साथ क्यों किस्मत ने ऐसा छल किया? एकही एक ऑलाद, और वोभी छिन गयी??

खैर...! वंदन, उन सबसे पहली बार मिल रहा था...मैंने अपनी आँखोंमे भर आए आँसू छुपाते हुए, उनका वंदन से परिचय कराया.....निम्मीकी दोनों बेटियाँ भी बडीही स्नेहमयी थीं...बड़ी ज़रा मोटू..छोटीवाली छरहरी....मेरे बच्चे शायद ज़रा अंतर्मुख थे...लेकिन इन दो लड़कियों ने पलभर मे ऐसा मौहोल बनाया मानो, उनका रोजमर्रा का मेलजोल हो....!

मेरे पती शेहेरके बाहर गए हुए थे....अगले दिन शामको लौटने वाले थे...सोचा, देखते हैं...गर फिर एकबार हम सब इकट्ठे हो सकेँ तो...लेकिन, उनके आनेपरही इन सभीको बुलाना...इतना धीरज मुझमेही नही था....बेकरार हो उठी थी सबसे मिलनेके लिए....!

खाना कब परोसा गया...कब खाया गया...समय किस रफतारसे बीतता गया....पताही नही चल रहा था.....हर व्यंजनकी तहे दिलसे तारीफ़ करते हुए, निम्मीके सास-ससुरने भोजन किया....निम्मीकी बड़ी लडकी, मेरा बेटा और वंदन, तीनो शतरंज के अच्छे खिलाड़ी थे....निम्मीकी छोटी लडकी को संगीत और नृत्य मे बेहद रुची थी....
उसे मेरा तबला और पेटी दिख गयी..मैंने तो उन्हें छूना पता नही कबसे बंद कर दिया था....वो जब हाथ धोने मेरे कमरेमे गयी तो उसने ये साज़ देख लिए....मुग्धता से उन्हें निहार रही थी, और मेरी नज़र पड़ गयी....मैंने कहा,
" क्यों, मन है इन्हें एकबार सुरमे लानेका?"
"जी, मासी...बोहोत...मै बजा सकती हूँ???"मुग्धाने मुझसे पूछा...हाँ, उसका नाम मुग्धाही था...
"बच्चे, ज़रूर...इनकी तो किस्मत खुल गयी...!" मैंने खुश होके कहा...
उसने पलकीभी देरी नही की....नाही उसे कोई झिझक थी....हारमोनियम को सुरमे लाके, उसने तबलेपेभी अपना हाथ आज़माया...साथ मीठी, सुरीली आवाजमे गुनगुनाती रही...

इधर मेरा बेटा, निम्मीकी बड़ी बेटी, शुभ्रा और वंदन शतरंज लेके बैठ गए....वैसे खेल तो शुभ्रा और वंदन रहे थे, लेकिन मेरे बच्चे, दोनोंके बीछ टांग अडा रहे थे....शुभ्रा वंदन को चेकमेट देनेही वाली होती,कि, मेरा बेटा, उमंग, वंदन को आगाह कर देता...और शुभ्रा चिल्लाके मुझे पुकारती...,
" मासी...इसे यहाँसे हटाओ ना...देखो इसने तीसरी बार, मेरा बँटा धार किया है.....!"
मै उसे वहाँसे हटनेके लिए कहती तो वंदन, उसे खींचके अपने पास बिठा लेता...मेरी बिटियाने शुभ्राको आगाह करना शुरू कर दिया...हालाँकि वो, (मोहिनी),इतनी माहिर नही थी, जितना कि मेरा बेटा...

चायका समय होने आया तो मैंने पास जाके सारे मोहरे उलट पलट दिए.....!तब कहीँ जाके वंदन उठा और हमलोगोंके साथ आ बैठा.....निम्मीके सास-ससुर, खानेके बाद कुछ देर आराम करने कमरेमे चले गए थे...मै चाय बनाने रसोईमे मुडी तो निम्मी और वंदन, दोनों मेरे साथ आके खड़े हो गए ......
बातचीतका एक अलगही दौर चल पडा....जिसने हमारे बचपनकी और रुख किया...और फिर अपने, अपने जीवनके उतार चढाओं के ओर मुड़ गया....
कई घटनाएँ ऐसी थीं, जिनसे वंदन वाक़िफ़ नही था...और उसके अपने जीवनमे काफ़ी कुछ था, जिससे मै और निम्मी वाक़िफ़ नही थे.....

हम तीनों बातों मे लग गए तो हमारे बच्चों ने बिन कहे, चाय-नाश्तेके दौरको अपने आप सँभाल लिया...अपने दादा-दादीको चाय नाश्ता परोस दिया....उन्हें बगीचेमे ले गए....पताही नही चला कि, कब शाम गहराती गयी....
"चलो, हम सभी रातका खाना कहीँ बाहर खा लेते हैं....!"
"हाँ, हाँ, ऐसाही ठीक रहेगा...चलिए मासी, आपकोभी थोडा आराम मिल जायेगा...", मुग्धा बोल पड़ी.....निम्मीनेभी ज़ोर दिया...सबका यही विचार था कि, कुछ और समय इकट्ठे बितानेके लिए मिल जायेगा....

निम्मीके सास-ससुरने कहा," भई, हमलोग तो रातमे मुश्किल से कुछ खाते हैं...और वैसेभी दोपेहेरका भोजन अभी हज़म नही हुआ...हम दोनोको तो गेस्ट हाउस छोड़ दो...तुम सब घूम आओ.."

मेरे बेटे उमंगने कहा," पर हम चारों कहीँ और जाएँगे...आपलोगोंके साथ नही.....ममा...हमने तो सोच लिया कि, मल्टीप्लेक्स मे जाके १० बजेका शो देखेंगे.....चलेगा ना?"

सब इस तरहसे हिलमिल गए थे कि, मेरे ना कहनेका सवालही नही उठता था....
निम्मी मुझसे बोली," उफ़! तू मेरी साडी तो देख...कितनी चुम्हला गयी है...कैसे लगेगी॥?"
"तो क्या? तू मेरी कोई साडी पेहेन ले....चोली तो एकदम अच्छी है...इसी चोलीपे मेरी ४/५ साडियाँ पहनी जा सकती हैं...चल आ मेरे कमरेमे...और चुन ले....!"मैंने उसे खींचके उठाते हुए कहा....

"मतलब तुम दोनों तो खूब सज सँवर लोगी और मै ऐसेही चलूँ...? या तो तुम दोनोका ड्रायवर लगूँगा या बॉडी गार्ड.... ........!"वंदन कह उठा....
" अब चल भी ...ज़्यादा नाटक नखरे मत दिखा...", मै बोल पड़ी...
"मुझे कमसे कम मुँह हाथ धोनेका तो मौक़ा दोगी या नही तुम दोनों..?"
वंदन ने बड़े नाटकीय ढंगसे हाथ जोड़ते हुए कहा....
" हाँ, हाँ....लो, चलो, मौक़ा और तौलिया दोनों हाज़िर हैं..!."मैंने स्नानगृह की ओर इशारा करते हुए कहा.....

चंद मिनटों मे सब तैयार हो गए....बच्चों ने अपना रुख कर लिया...हम तीनों ने पहले, माँ और बाबूजी को गेस्ट हाउसपे छोडा और फिर एक ज़रा शांत होटल की तलाशमे निकल पड़े.... चयन का काम तो मुझपेही सौंपा गया....

याद नही कि तक़रीबन चार घंटे कैसे बीत गए.....वंदन, जोकि, दूसरेही दिन लौटने वाला था...और दो दिनों के लिए रुक गया....इधर मेरे पतीकी वापसी ३ दिनोंके लिए और आगे मुल्तवी हो गयी...वंदन चाह रहा था कि, इनसे मिलता जाय ...पर आसार नज़र नही आ रहे थे....

मै मनही मन खुश थी कि, निम्मीको अपने दुखोंसे, यादों से, कुछ तो निजात मिल रही थी....उसकी उदासी किसी परछाई की तरह, उड़न छू होते जा रही थी.....फिरभी, बेमौसमकी बदरी की भाँती, लौटभी आती....लाज़िम था....घाव हरा था...बहने लग जाता....

अगले दिनका क्रम हमलोग तय कर रहे थे......जितनाभी समय हमलोगोंके पास था, हमने इकट्ठे ही बिताना था...ऐसा मौक़ा फिर मिले ना मिले....किसीको कोई ऐतराज़ भी नही था....निम्मीके सास-ससुर तो निम्मीके लिए खुश ही हो रहे थे....हम बिछडे इस्तरह्से मिले थे, जैसे कभी जुदा हुएही न हों.....इन दो-तीन दिनोंमे कितना कुछ घटनेवाला था, किसे ख़बर थी...?
क्रमशः

1 टिप्पणी:

  1. हिन्दी चिटठा जगत में आपका स्वागत है , ऐसे ही अपनी लेखनी से हमें परिचित करते रहें

    धन्यवाद
    मयूर दुबे
    अपनी अपनी डगर

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