सोमवार, 27 अप्रैल 2009

क्यों होता है ऐसा.?..१

हम क्यों कहते हैं," बद अच्छा बदनाम बुरा?" पहले नही समझ आती थी मुझे...बरसों नही समझी कि , इस कहावत का क्या मतलब होगा...सुनती रही बडोंके मुहसे...लेकिन इसका मतलब जान लेनेकी पता नही क्यों, कभी कोशिश नही की...और फिर खुदही जान गयी...जब एकबार मुझपे गुज़री...
वही कुछ वाक़यात बताने जा रही हूँ...

बचपनमे हमें सिखाया गया था, हर हालमे सत्य ही कहना...तो हम बच्चे हर हालमे सत्य ही बोलनेपे अमादा रहे...हाँ...ज़िंदगी जीते, जीते इतना सीखे कि , किसीकी आबरू या जान बचानी हो तो उस समय ज़रूरी नही कि, जो व्यक्ती वही करनेपे तुला हो, उसीके सामने किसीका "सत्य" उजागर किया जाय...
पहले मजबूरी तो जान ली जाय, अपनेआपको खुदा से बढ़के ना समझें...न्याय-अन्याय, सत्य-असत्यका फैसला उस विराट शक्तीपे छोड़ दें...जिसने असत्य कहा होगा, उसकी हालत तो देखें..कि उसपे क्या गुज़र रही होगी...गर वो किसी बोझ तले दबा है,तो पहले उसे तो प्यारसे हल्का करें..उसे तो आश्वस्त करें....ज़रूरी नही कि उसेही कट्घरेमे लेके और दर्द पोहोंचाया जाय...खुदका " सत्य वचनी सत्यवान" होनेका दावाही एहेम समझा जाय...

कोई बच्चा झूट बोलनेकी शिक्षा लेके जन्म तो नही लेता...इन्सानपे दो चीजोंका असर होता है..और ये मनोविज्ञानिकों का माना हुआ " सच" है...वो ये: १)अनुवंश( heredity) २) परिसर (environment).
बड़ा होते, होते बच्चा जाने अनजानेमे गौर करता है, कि किस चीज़मे अधिक फायदा है...वो एक स्पंजकी तरह अपने अतराफ़ मे होती बातें,अपने अन्दर सोखता रहता है.. उसकी माँ, बाप तथा अन्य व्यक्ती, कब क्या कहते हैं, करते हैं...इसीलिये तो कहते हैं, कि, बच्चों के सामने ज़बान सम्भालके बात करनी चाहिए....खैर...

जब ज़िन्दगीमे क़दम रखा तो देखा, सच बोलनेपे बड़ी डांट भी सुननी पड़ती है...अपनी खैर मानानी हो, तो बेहतर लगता है , थोड़ा-सा झूट बोल देना..जैसे किसीने पूछा ," दवाई लेली?"
अब मनमे ये जानती होती कि, मेरी सेहेतकी तो ,पूछनेवाले को परवाह नही, लेकिन सबके आगे दिखावा है...और मै येभी जानती थी, कि मै भूली नही, लेकिन एक पलकीभी मोहलत नही मिली कि खा लूँ...गर कहूँ,कि, मोहलत नही मिली, तो बेहद आफत...सुनना पडेगा," ऐसाभी क्या काम था...क्या सारा समय कामही करती रहती हो?"
गर कहती ," हाँ! आपहीने तो मुझे कहा था, कि पहले ये सब ख़त्म करना...फिर और कुछ...इस समय तक ये सब होनाही चाहिए..कोई बहाना नही.."तो औरभी बड़ी आफत...!
बेहतर के कह दूँ ," भूल गयी...अभी लेती हूँ..",क्योंकि, ऐसा कहके वाकई,सब काम रोकके, मै दवाई ले सकती थी..!

फोन आ जाय और कह दूँ," हाँ हैं, देती हूँ...",तो सुनूँ," किसने कहा था, घरपे हैं कहनेको? कह नही सकती थी, के नही हैं?"
अगली बार फोन बजा तो उठानेसे पहले पूछा,इशारेसे, कि, क्या जवाब देना चाहिए...इशारा हुआ, बाहर गए हुए हैं, कह दो।
मैंने फोनपे,कौन बोल रहा है ये जान लेने के बाद कह दिया," वो तो बाहर गए हैं....... ...."
वहाँसे पूछा गया," अरे...! कहाँ गया है? उसने तो मुझे अभी १० मिनिट मे मिलने बुलाया था...कबतक लौटेगा?"
अब मै बौखला गयी...मुडके देखा,तो, जिनसे पूछना चाहिए..वो नज़रके परे...मैंने कह दिया," जी..वो तो पता नही..."
"लेकिन गया कहाँ है? " उधर पूछा गया...
" शायद...शायद...अस्पताल....", कहते हुए मै पसीना, पसीना हो रही थी...क्योंकि बात करनेवाला व्यक्ती हमारा बेहद करीबी था...!
" अस्पताल? क्यों? क्या हुआ? सुबह तो कुछ कहा नही...! कौनसे अस्पताल?" उधरसे पूछा गया...
"नही, वैसे कुछ ख़ास नही..मतलब ज़रा गला ख़राब था..और...थोड़ा बुखारभी...तो.."अबतक मै तकरीबन हकलाने लगी थी...
" चलो ठीक है...जब लौटे तो कह देना मेरा फोन था...अबतो मै लेट हो जाऊँगा....मुझेभी आगे जाना है..वो तो उसने कहा था, 'मुझे साथ ले चलना' ....ऐसा कैसा किया उसने...एक फोन तो कर देता...मैंने अपनी दूसरी appointment मुलतवी कर दी थी..." उस व्यक्तीने मुझसे कहा और फोन नीचे रख दिया...

मैंने ,अन्दर आके फोनपे हुई बातचीतके बारेमे बताया.....और वो व्यक्ती मुझपे आग बरसाने लगा," तुम्हें किसने कहा था कि इस व्यक्तीको ऐसा कहना? तुम्हें अपनी अक़ल नही थी? उसके साथ जाना था, इसलिए तो मैंने सोचा कोई ऐरा गैरा होगा, उसे मै घरपे नही हूँ, ये कह दिया जाय..हद है तुम्हारे बेवक़ूफ़ीकी...जाओ..अभी फोन करो उसे और कहो,कि, मै आ गया हूँ.."
अब मुझे पहलेही ये बात बता दी गयी होती, कि फलाँ, फलाँ आदमी आनेवाला है..जिसके साथ इन्होने जाना है, तो मै आगाह तो हो गयी होती...मै अंतर्ज्ञानी तो नही थी/या हूँ!

मैंने उस व्यक्तीका फोन घुमाया....वहाँसे आवाज़ आयी," वो तो निकल चुका है.."
ये इत्तेला देनेवाले जनाब उस व्यक्तीके पिता थे...उनके आगे मै और तो कुछ कह नही सकती थी...मैंने फोन रख दिया...

जब, इस बारेमे मैंने इत्तेला दी तो मुझे सुनाया गया," ये सब तुम्हारी बेवाकूफीके कारन हुआ...पता नही, उसके बाऊजी सच कहते थे कि झूट...बड़े घाग हैं...मेरा सारा काम तुमने चौपट कर दिया..."

ऐसे वाकयातके बाद मै फोन उठानेसे डरने लगी...गर, घंटी बजने देती तो आफत...उठा लेती तो ,निगाहेँ मुझपे गडी पाती, कि क्या जवाब दे रही हूँ...
एकबार मैंने कहा," रुकिए, मै देखके बताती हूँ...."
उधरसे जवाब आया," क्या ये बात उसने तुम्हें कहनेके लिए कही है? दो कमरोंका घर है...फोन रखा है वहाँसे तो पूरे घरपे नज़र जाती है, और आप कह रही हैं,'देखके बताती हूँ...'...नही फुरसत उसे तो सीधा कह दे..अव्वल तो काम उसीका था..और बीबीसे कहलवा रहा है," देखके बताती हूँ' ऐसा कह दे...कह दो उसे कि, अब मै दो दिन बाहर हूँ...दो दिनके बाद जब तुम्हें वो 'दिख'जाय तो बता देना...मेरा फोन था", और उधरसे फोन पटक दिया गया...

जैसेही मै पीछे मुडी, जिसके लिए फोन था, वो रु-ब रु !!!
"किसका फोन था",मुझसे पूछा गया...
मैंने डरते,डरते बता दिया...
तो सुनने मिला," हद है...ठीक ही कह रहे थे वो..दो कमरोंका तो घर है...कैसे इतनी बेवकूफ हो?
अब यही बात पहले कई बार मुझसे कही गयी थी,कि, जब किसीको सच ना बताना हो तो, ऐसा कह दिया जाय...!

खैर, आगेभी ज़िन्दगीमे मुझे ये एहतियात हमेशा मिलती रही," अब मै ऐसे कहनेवाला/वाली हूँ...! तुम अपनी मत चला देना...कहीँ कह दो,'अरे कौन-सी शादीमे जाना है यहाँसे...मुझे तो नही बताया..?"

ऐसाभी मौक़ा आया जब ,कहीँ शादीमे जाना है,ये बात मैंने एक समारोहमे कह दी...
अगलेने पूछ लिया," अच्छा? किसकी? किस इलाकेमे है? थोड़ा-सा तो खाके जाओ..."
" वो..इलाक़ा तो ...नही पता...मै.."....उफ़! मुझेही क्यों पूछ लेते हैं सब...?
मै वहाँसे हट गयी...मेरे कानपे अल्फाज़ पड़े," ये लोग अपनी औक़ात भूल जाते हैं...आगे शादीमे जाना है...जानता हूँ...इस लड़कीकी नाक चढी रहती होगी.."

येभी सीख गयी कि, जब "सीधी उँगली से घी ना निकले तो तेढीसे निकालना पड़ता है.."...इस कहावत का मतलब भी मै बरसों नही जान पायी थी...

और एकबार, केवल एकबार कुछ ४/५ वर्ष पहले, हताशामे आके मैंने बिना सोचे समझे झूट बोल दिया तो...उफ़ !
उस एक झूटने मेरा पीछा कभी नही छोडा...शायद ता-उम्र नही छोडेगा....मेरा हर सत्य, उस "झूट" के निकशपे तलाशा जाता है...मैंने अपने बच्चों को कभी सच बोलनेसे रोका नही...लेकिन...बल्कि हमेशा सराहा....इसलिए, यही बात मेरे आड़े आ गयी...

अगली बार बताउंगी वो क्या था...क्या चाहा था, और हो क्या गया था...कारन यही था, कि, मै मंझी हुई "झूटी" नही थी...
ज़िंदगी मे इस एक बात के कारन कितनी अधिक तबाही मची....तबतक मै बदनाम नही थी..नाही बद....जबकि, ऐसा साबित करनेकी हर मुमकिन कोशिश की गयी थी....

क्रमशः

4 टिप्‍पणियां:

  1. हम मोतिकदे मेरे नहीं हैं, खता मुआफ
    ऐसी भी क्या गजल जो कलेजा निकाल दे
    मेरे जैसे हंसने हंसाने वाले इन्सान को भी आपने अपनी तहरीर सो संजीदा कर दिया. बहुत बुरा किया.

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  2. शमा जी आपने जो कुछ बयान किया है आँखें खोलता है। मुझे लगा कि आपने सब मेरे ऊपर लिखा है। मैं भी कभी-कभी ऐसा करता हूँ,लेकिन आपके लेख पढ़ने के बाद मेरी आँखें खुल गईं हैं। आज से अपनी आदतें बदलूँगा। आपने जिन भावनाओं को व्यक्त किया है वो बहुत ही क़ॉमन हैं और अक्सर ऐसा देखने को भी मिलता है। बहुत ख़ूबी से आपने लिखा है।

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