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शनिवार, 2 जनवरी 2010

बोले तू कौनसी बोली ? ५


कई किस्से ऐसे हैं, जो मै कभी लिख नही पाऊँगी...! कहना कुछ चाह रही थी, और कहा कुछ...! वो भी भरी महफिल मे!सुनने वाले तो पेट पकड़ के हँस रहे थे, और मुझे लग रहा था, कि, ज़मीं मे गड़ जाऊँ! तो ऐसी बातों को छोड़ के आगे बढ़ती हूँ...!

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

बोले तू कौनसी बोली! २ दुमजली बस!

मै स्कूल मे चार भाषाएँ सीखती रही..... चूँकि मेरी मातृभाषा मराठी नही थी, मै और अधिक सतर्कता से उस ओर गौर करती...उसमे मुझे मराठी गीत, या अन्य रेडिओपे होनेवाले कार्यक्रम, इनकी बड़ी सहायता मिली...इतनी,कि, मै हर भाषामे सबसे अधिक अंक प्राप्त कर जाती...मराठीके कुछ गीत जो लताजी के गाये हुए हैं, मै उन्हें ताउम्र भूलही नही सकती...!

अब ज़िन्दगीमे ऐसे मौक़े आए जब मुझे ये भाषा, किसी अमराठी भाषिक को सिखानी पड़ गयी...उनमे मेरे बच्चे तो शुमार थेही..उसके पहले मेरे पती शुमार हो गए...सेवा कालके पहले कुछ साल तो डेप्युटेशन पे गुज़रे...लेकिन जब होम कैडर मे लौटे,तो मराठी का इम्तेहान देना ज़रूरी हो गया....हम लोग ठानेमे थे उन दिनों...समय कम मिलता था, इन्हें सिखाने के लिए...जब कभी, किसी कारन, ठाने से मुम्बई जाना होता ,या फिर जब वापस लौटते, तो मै इनके पाठ शुरू कर देती...उन दिनों पहली बार मुझे समझ मे आया कि, मराठी, देशकी सबसे अधिक क्लिष्ट भाषा है! ! और बांगला सबसे अधिक आसान! ये तो मैंने शुक्र मनाया कि, मराठी और हिन्दी की लिपि देवनागरी ही है...न होती,तो पता नही" मेरा क्या होता(कालिया)?"

अब इस भाषा का व्याकरण मैंने तो ईजाद किया नही था...पर जब कभी इन्हें टोक देती तो ये मुझपे बरस पड़ते...! मानो ये टेढा व्याकरण मेरी ईजाद हो! ख़ैर, किसी तरह पास तो होही गए....वरना तनख्वाह मे बढोतरी रुक जाती!
अब बच्चों की भी बारी आ गयी थी...और हमारी पाठ्य पुस्तकें तो सीधे साहित्य सिखाने चल पड़ती हैं...बोली भाषा नही!

ऐसेही एक शाम याद है...कुछ इनके सहकारी, हमारे घर भोजनपे आए हुए थे। पती पुलिसमे , महाराष्ट्र कैडर के ..पत्नी डॉक्टर...सिविल अस्पताल मे नौकरी करती थीं...उन्हें भी मराठी की परीक्षा दिए बिना चारा नही था..!
जब इनके पती कोल्हापूर मे तबादले पे आए हुए थे, मोह्तरेमा को , अखबारों के मध्यम से मराठी सीखने की सूझ गयी...

बोली," मै सुबह चाय की चुस्की लेते,लेते मराठी अख़बार की हेड लाइन्स पढ़ ने लगी...छपा था," एक दुम जली बस गड्ढे मे गिरी "!( ये वाक्य ,वैसे तो मराठी मे था...यहाँ,पाठकों की सुविधा की खातिर हिन्दी मे लिख रही हूँ..)...
"अब मै हैरान..मैंने अपने अर्दली से पूछा,भैया, ये क्या चक्कर है...हमने हवाई जहाज़की दुमके बारेमे सुन रखा था...अब ये बस की कहाँ से दुम पैदा हो गयी......और पहले दुम जली, फिर वो जाके गड्ढे मे गिरी....!
"मैंने ने जब ये अर्द्लीको पढ़के सुनाया तो वोभी बौखला गया...ऐसी बात उसनेभी कभी सुनी थी ना पढी थी...!"

खैर, उस महिलाने जैसेही वो हेड लाइन सुनायी, मेरा हँसीके मारे बुरा हाल हुआ जा रहा था....लोग मुझे निहार रहे थे,कि, इसे हो क्या गया है,जो इतना अधिक हँसती चली जा रही है...!
मै थी,कि, उन्हीं के मूहसे वो अफ़साना गोई सुनना चाह रही थी...बिना दख़ल दिए...समझ रही थी, कि,किस ग़लत फ़हमी के कारण, ये अजीबो गरीब, और हास्यास्पद प्रसंग उभरा है...

खैर, उन्हों ने आगे सुनाया," मैंने उसे अखबार थमाते हुए कहा, 'देख ये, पढ़ इसे, और मुझे बता के ये क्या चक्कर है...पहले तो बसकी दुम जली और जाके गड्ढे मे गिरी...अर्द्लीने पढ़ा और अपनी हँसी को दबाते हुए बोला,'बाई साहेब, ये लिखा है,"दुमजली" लेकिन इसे मराठी मे पढ़ा जाएगा," दु मजली", मतलब दो मंज़िली...डबलडेकर बस!"

लिखा तो "दुमजली", इसी तरह से जोडकेही जाता है, पढ़ते समय, दु मजली पढा जाता है!

अब सारे मेहमान हँस हँस के लोटपोट होने लगे! !

इस वाक़या के बाद जब कभी मै अपने या किसी औरके बच्चों को मराठी या हिन्दी सिखाती और ग़लत संधि विच्छेद से पढ़ते सुनती, तो मेरा ये "कोड वर्ड"बन गया था..मै कहती रहती," दुमजली, दुमजली."...इशारा होता, अलग, अलग तरहसे संधि विच्छेद करके आज़माओ!!!

एक बार मुम्बई से नाशिक जा रही थी..बोगीमे काफ़ी सारे परिचित मित्र आदि बैठे मिले...बातोंमे बात चली तो मैंने, उन मे से सभी हिन्दी भाषिकों को " दुमजली" ये शब्द ,देवनागरीमे लिखके पढने के लिए दिया...सभीने उसे "दुमजली" ही पढ़ा...और हैरानीसे पूछा, "ये बताओ, पहले, कि, बस की दुम जली और फिर गड्ढे मे गिरी, ये लिखना कुछ ख़ास दर्शाता है क्या....."

जब सही संधि विच्छेद सामने आया तो पूरी बोगी ठहाकों से गूँज उठी....

भाषा भेदसे मैंने लोगों मे ज़बरदस्त मनमुटाव होते देखा है..लेकिन इन संस्मरणों मे सिर्फ़ मज़ेदार किस्से ही बयाँ करूँगी!

अगली बार कुछ और...ऐसे तो पिटारे भरे पड़े हैं!

क्रमश:

बुधवार, 23 सितंबर 2009

बोले तू कौनसी बोली ? ८

बड़े दिनों बाद इस ब्लॉग पे लिख रही हूँ...कई बार यह दुविधा रहती है,कि , जिस भाषाकी वजह से मज़ेदार अनुभव आए/हुए, वह भाषा भी पाठकों को आनी चाहिए...तभी तो प्रसंग का लुत्फ़ उठा सकते हैं / सकेंगे...बड़ा सोचा, लेकिन अंत मे इसी प्रसंग पे आके अटक गयी...खैर...! अब बता ही देती हूँ...

छुट्टी का दिन और दोपहर का समय था। मै मेज़ पे खाना लगा रही थी...एक फोन बजा...मैंने बात की...फिर अपने काम मे लग गयी...

कुछ समय बाद जब मेरे पती खाना खाने बैठे,तो मुझसे पूछा,
" कौन मर गया?"
मै :" मर गया? कौन ? किसने कहा?"

पती: " तुमने ! तुमने कहा..."

मै : " मैंने कब कहा? मुझे तो कुछ ख़बर नही !! क्या कह रहे हो....!"

पती: " कमाल तुम्हारी भी...कहती हो और भूल जाती हो...!"

मै :" कब, किसे कहा, इतना तो बताओ...!"

पती: " मुझे क्या पता किससे कहा..मैंने तो कहते सुना..."

मै :" लेकिन कब? कब सुना...? इतना तो बता दो...! मै तो कल शाम से किसी को मिली भी नही..और ये बात तो मेरे मुँह से निकली ही नही .... "
मै परेशान हुए जा रही थी...ये पतिदेव ने क्या सुन लिया...जो मैंने कहाही नही....!!!

पती:" अभी, अभी, खाना लगाते समय तुम किसीको कह रही थी कि, कोई मर गया...किसका फोन था?"
मै :" फोन तो मेरी एक सहेली का था...शोभना का...लेकिन उससे मैंने ऐसा तो कुछ नही कहा...वो तो मुझसे नासिक जाने की तारीख पूछ रही थी...बस इतनाही...मरने वरने की कहाँ बात हुई...मुझे समझ मे नही आ रहा...???"

बस तभी समझ मे आ गया...मै ज़ोर ज़ोर से हँसने लगी...

मै : उफ्फो...!! मै उसे तारीख बता रही थी..मेरे नासिक जानेकी..मराठी मे कहा,' एक मेला...'..."

इसका अगला पिछ्ला सन्दर्भ पता न हो तो वाक़ई, मराठी समझने वाला, लेकिन जिसकी मूल भाषा हिन्दी हो , यही समझ सकता है जो इन्हों ने समझा.."एक मेला" इस आधे अधूरे वाक्य का मतलब होता है," एक मर गया"...मेला=मर गया...
मुझे शोभना ने पूछा: "( मराठीमे) तुम नासिक कब आ रही हो?"
मेरा जवाब था: " एक मेला... "....मतलब, मई माह की एक तारिख को...एक मई को.... पती ने वो सन्दर्भ सुनाही नही था...जब शोभना ने मुझसे फिरसे पूछा:" पक्का है ना?"( मराठीमे =नक्की ना...एक मेला?")
जवाब मे मैंने कहा था : " हाँ पक्का...( नक्की...)' एक मेला', ...(एक मई को...)।

मै शोभना को बार, बार 'एक मेला' कहके यक़ीन दिला रही थी...और वो यक़ीनन जानना चाह रही थी, क्योंकि, मुझे एक वर्क शॉप लेना था!! नासिकमे...तथा उस मुतल्लक़ अन्य लोगों को इत्तेला देनी थी...जो काम शोभना को सौंपा गया था...!!!!

इतनी बार जब मैंने उसे" एक मेला' कह यक़ीन दिलाया, तो मेरे पतिदेव को यक़ीन हो गया कि,कोई एक मर गया ....और मै नकारे चली जा रही थी...जितना नकार रही थी, इनका गुस्सा बढ़ता जा रहा था...!

रविवार, 21 जून 2009

बोले तू कौनसी बोली ? ५

कई किस्से ऐसे हैं, जो मै कभी लिख नही पाउंगी...! कहना कुछ चाह रही थी, और कहा कुछ...! वो भी भरी महफिल मे!
सुनने वाले तो पेट पकड़ के हँस रहे थे, और मुझे लग रहा था, कि, ज़मीं मे गड़ जाऊँ! तो ऐसी बातों को छोड़ के आगे बढ़ती हूँ...!

कुछ बातों का मज़ा लिख के नही लिया/दिया जा सकता...उन्हें सुनना ही ज़रूरी होता है...तो ऐसी बातें भी फेहरिस्त से हट गयीं...!खैर !

एक अंग्रेजी मध्यम मे पढ़ रहे बच्चे को, उसकी ११ वी की परीक्षा को मद्दे नज़र रख, हिन्दी पढ़ाने/सिखाने की कोशिश कर रही थी...
अपनी पाठ्य पुस्तक मे से वो कुछ संस्मरण पर लेख पढ़ रहा था...एक ख़ास शब्द सुना तो मै ज़ोर से हँस पड़ी..."हमस फर"!.....मैंने कहा," फिर एक बार पढो...."!
उसने दोबारा वैसे ही पढा...
मैंने वही बात दोहराई...! वो परेशान होके मुझ से बोला," आप किताब मे देख भी नही रहीँ, और मुझ से कह रहीँ हैं, दोबारा पढो...मै जो पढ़ रहा हूँ, वही लिखा है..!"
"हाँ ! पता है, लेकिन तुम्हारा उच्चारण ग़लत है...!",मैंने बिना किताब देखे ही उसे बताया...
" होही नही सकता..!"उसने बहस करनी शुरू कर दी...!
"अच्छा ? तो फिर इस शब्द का मतलब मुझे बताओ,"मैंने कहा...
"मतलब तो मुझे नही पता..मतलब पता होता तो आपके पास पढने क्यों आता?" उसने शरारती तरीक़े से प्रतिप्रश्न किया!
ये बच्चा था, मेरी बहन का बेटा...!
मैंने, अपनी बहन को फोन लगाया और कहा," तुम एक शब्द का मतलब बता सकती हो?"
"मै? कमाल है? ऐसा कौनसा शब्द होगा जिसका अर्थ मुझे आता हो और आपको नही!"उधर से फिर एक सवाल हुआ...!
"अच्छा, कोशिश तो करो....!"कह के मैंने वही शब्द दोहराया...
"क्या कहा? ये भी कोई शब्द है? ना बाबा...मुझे नही समझ मे आ रहा...और आप इतना हँस क्यों रहीँ हैं?"उसने हैरानी से पूछा !
"तेरा बेटा जो पढ़ रहा है...!अच्छा, अब सुन...मै तुम दोनों को एक साथ ही बताती हूँ...! वो उस शब्द का संधी विच्छेद ग़लत कर रहा है...अब तो मैंने पोल खोल दी...अब तो बता...!"मैंने फिर एक बार अपनी बहन से पूछा...

"ऐसा कौन-सा शब्द हो सकता है? अभी, बता भी दीजिये...! मेरे पेट मे खलबली मच रही है", बहना बोली...
"अरे बाबा, शब्द है,' हम सफ़र'.....",अंत मे मैंने उसे बता ही दिया...और वो भी खूब ज़ोर ज़ोर से ठहाके के साथ हँस पड़ी....

लेकिन उसके सुपुत्र ने पूछा," हम सफ़र? उसका क्या मतलब ? मै तो अभी भी नही समझा...!'हम तकलीफ दे रहे हैं' ऐसा मतलब होता है इसका?"

अब की बार मेरी बोलती बंद हो गयी...!
मै भूल गयी,कि, ऐसे कई शब्द तो मै हिन्दी गीत सुनते सुनते सीख गयी थी....! किसी ने सिखाया तो नही था...! और ये बच्चे कभी हिन्दी गीत सुनते ही नही थे...!

ऐसे कई क़िस्से इस बच्चे के साथ हुए...! क़िस्से तो बहुतों के साथ हुए, लेकिन, मराठी तथा अंग्रजी भाषा, एक साथ जब तक पढने वाले ना जाने, बयान करना मुश्किल है....फिर भी अगली बार कोशिश ज़रूर करूँगी...!
उपरोक्त क़िस्सा भी जो लिखा, उसे सुनने मे अधिक मज़ा आता है...हिन्दी भाषिक पढ़ते समय तुंरत समझ जाते हैं....!

बुधवार, 17 जून 2009

बोले तू कौनसी बोली ? ४

काफ़ी साल हो गए इस घटनाको...बच्चे छोटे थे...हमारे एक मित्र का तबादला किसी अन्य शेहेर मे हो गया। हमारा घर मेहमानों से भरा हुआ था, इसलिए मेरे पतीने उस परिवार को किसी होटल मे भोजन के लिए ले जाने की बात सोची।

एक दिन पूर्व उसके साथ सब तय हो चुका था... पतीने उससे इतना ज़रूर कहा था, कि, निकलने से पहले, शाम ७ बजेके क़रीब वो एकबार फोन कर ले। घरसे होटल दूर था...बच्चे छोटे होने के कारण हमलोग जल्दी वापस भी लौटना चाह रहे थे।

उन दिनों मोबाईल की सुविधा नही थी। शाम ७ बजे से पहलेही हमारी land लाइन डेड हो गयी...! मेरे पती, चूंकी पुलिस मेहेकमे मे कार्यरत थे, उन्हों ने अपने वायरलेस ऑपरेटर को, एक मेसेज देके उस मित्र के पास भेजा," आप लोगों का सहपरिवार इंतज़ार है..."

हमारे घर क़रीब थे। ऑपरेटर पैदल ही गया। कुछ देर बाद लौटा और इनसे बोला," उन्हों ने फिर एकबार पूछा है..उन्हें मेसज ठीक से समझ नही आया..."
हम दोनों ही ज़रा चकित हो गए...मैंने इनसे कहा," आप एक चिट्ठी लिख दें तो बेहतर न होगा?"
"अरे, इतनी-सी बात है...उसमे क्या चिट्ठी लिखनी?"
इतना कह,इन्हों ने फिर एकबार अपनी बात उस ऑपरेटर के आगे दोहरा दी।
ऑपरेटर जाके लौट आया। हमारा फोन तो डेड थाही। तकरीबन ९ बजे उसमे जान आयी...एक हलकी-सी'ट्रिंग" की आवाज़ मुझे सुनाई पड़ी...! मैंने इन्हें झट अपने मित्र को फोन करने के लिए कहा...
इन्हों ने फोन घुमाया," अरे यार! क्या हो गया है तुम लोगों को? हम शाम ७ बजे से इंतज़ार कर रहे हैं...अब ९ बजने आए...! कहाँ रह गए हो? हमसे ज़्यादा तो तुझे जल्दी थी, बच्चों के कारण.....!"

" लेकिन तूने तो कहा था,कि, बस हमही लोग हैं...तूने ये औपचारिकता क्यों कर दी? और लोगों को क्यों बुला लिया?" हमारे मित्र ने कुछ शिकायत के सुर मे कहा पूछा।

"लेकिन तुझे किसने कह दिया कि, और लोगों को आमंत्रित किया है? बस तुम लोग हो और हम चार...! "मेरे पती ने कहा...

"अरे यार ! मैंने तो दो बार पुछवाया, कि, और कौन आनेवाला है, और तू कहता रहा,'सफारी पेहेन के बुलाया है'...अब सफ़ारी सूट तो औपचारिक आयोजनों मे पहना जाता है..मै तो कुरता पजामा पेहेन आनेवाला था...मेरी बीबी अब सफ़ारी पे इस्त्री कर रही है....!"

"अरे भैया , तुझे किसने कहा 'सफ़ारी' पेहेन के आने को....? अब जैसा है वैसा ही आजा..." इनकी आवाज़ शायद कुछ अधिक बुलंद हुई होगी, क्योंकि, उसकी पत्नी ने सुन ली...!

इनके मित्र ने जवाब दिया," यार, अब मेरी बीबी कह रही है, इतनी मुश्किल से तो ये सूट ढूँढा...कहाँ loft पे पडा मिला...अब यही पहनो...उसने इस्त्री भी की है...खैर, आते हैं हमलोग..बस और ५ मिनिट दे दो...!"
मुझे ये सँवाद सुनाई पड़ रहा था, और बात समझ मे आने लगी तो मेरी हँसी छूटती जा रही थी, और इन्हें गुस्सा चढ़ता जा रहा था..!

इन्हों ने ओपरेटर को बुला के डाँटना शुरू किया," कमाल है तुम लोगों की...इतना सीधा मेसेज समझ नही सकते..वायरलेस पे क्या समझते होगे? मै "सेह्परिवार" कहता चला जा रहा था, और तुम "सफ़ारी" सुन रहे थे?"

अब ये 'उच्चारण 'का भेद मुझे समझ मे आ रहा था... मराठी मे "सह परिवार" इसतरह उच्चारण होता है, जबकि, ये 'सेप्ररी वार "...इस तरह से उच्चारण कर रहे थे...और वो लड़का उसे 'सफ़ारी" सुन रहा था...!

मैंने अपने पती का गुस्सा शांत करने के ख़ातिर कहा," आप अपने आपको चंद रोज़/माह आगे कर के देखो...आपको ख़ुद इस बात पे हँसी आयेगी...तो अभी ही क्यों न हँस लें?"

खैर! मेरा वो प्रयास तो असफल रहा...लेकिन, ये सच है,कि, चंद रोज़ बाद इसी बात को याद कर हम सब खूब हँस लेते थे...जब कभी अपने अन्य दोस्तों को बताते....बडाही मज़ा लेके बताते...अब तो जब सफ़ारी की बात निकलती है, हम उसे 'सह परिवार' कहते हैं, और जब 'सह परिवार' की बात होती है तो उसे 'सफारी' कह लेते हैं....ख़ास कर मै ख़ुद!

शुक्रवार, 5 जून 2009

बोले तू कौनसी बोली ! ३

४/५ साल हो गए इस घटनाको...मै अपनी किसी सहेलीके घर चंद रोज़ बिताने गयी थी। सुबह नहा धोके ,अपने कमरेसे बाहर निकली तो देखा, उसकी सासुजी, खाने के मेज़ पे बैठ ,कुछ सब्ज़ी आदि साफ़ कर रही थीं.......१२ लोग बैठ सकें, इतना बड़ा मेज़ था...बैठक, खानेका मेज़ और रसोई, ये सब खुलाही था...

मै उनके सामने वाली कुर्सी पे जा बैठी...तबतक तो उन्हों ने सब्ज़ी साफ़ कर,आगेसे थाली हटा दी...मेरे आगे अखबार खिसका दिए और, फ़ोन बजा तो उसपे बात करने लगीं....

उसी दिनकी पूर्व संध्या को, मै मेरी अन्य एक सहीली के घर गयी थी...ये सहेली उस शेहेर के सिविल अस्पताल मे डॉक्टर थी। उसने बडीही दर्द नाक घटना बयान की...और उस घटना को लेके बेहद उद्विग्न भी थी...मुझसे बोली,
" कल मै रात की ड्यूटी पे थी....कुछ १० बजेके दौरान ,एक छोटी लडकी अस्पताल मे आयी...बिल्कुल अकेली...अच्छा हुआ,कि, मै उसे आपात कालीन विभाग के एकदम सामने खडी मिल गयी...उसकी टांगों परसे खून की धार बह रही थी....उम्र होगी ११ या १२ सालकी...

"मै उसके पास दौड़ी और उसे लेके वार्ड मे गयी...नर्स को बुलाया और उससे पूछ ताछ शुरू कर दी...उसके बयान से पता चला कि, उसपे सामूहिक बलात्कार हुआ था...जो उसे ख़ुद नही पता था...उसे समझ नही आ रहा था,कि, उन चंद लोगों ने उसके साथ जो किया,वो क्यों किया...इतनी भोली थी.....!अपने चाचा के घर गयी थी...रास्ता खेतमे से गुज़रता था...पढनेके लिए, अपने मामा और नानीके साथ शेहेर मे रहती थी...शाम ६ बजे के करीब लौट रही थी..."उस" घटना के बाद शायद कुछ घंटे बेहोश हो गयी...जब उसे होश आया तो सीधे हिम्मत कर अस्पताल पोहोंची....नानी के घरभी नही गयी....उसे IV भी चढाने लगी तो ज़रा-सा भी डरी नही...

मै जानती थी,कि,ये पोलिस केस है...अब इत्तेफाक से मेरे पती यहाँ पोलिस विभाग मे हैं,तो, मैंने उसकी ट्रीटमेंट शुरू करनेमे एक पलभी देर नही की...
"वैसेभी, हरेक डॉक्टर को प्राथमिक चिकित्चा के आधार पे ट्रीटमेंट शुरू करही देनी चाहिए...बाद मे पोलिस को इत्तेला कर सकते हैं..मैंने अपने पती को तो इत्तेला करही दी...लेकिन, अस्पताल मे भी पुलिस तैनात होती ही है...
वहाँ पे चंद मीडिया के नुमाइंदे भी थे..अपने साथ कैमरे लिए हुए...!

"यक़ीन कर सकती हो इस बातका, कि, उतनी गंभीर हालात मे जहाँ उस लडकी को खून चढाने की ज़रूरत थी...वो किसी भी पल shock मे जा सकती थी..मैंने ओपरेशन थिएटर तैयार करनेकी सूचना दी थी...उसे टाँके लगाने थे...और करीब ३० टांकें लगे...इन नुमाइंदों को उसका साक्षात् कार लेनेकी, उसकी फोटो खींचने की पड़ी थी...?
नर्स और वार्ड बॉय को धक्का देके..... पुलिस कांस्टेबल को भी उन ३/४ नुमाइंदों ने धक्का मार दिया..., उसके पास पोहोंच ने की कोशिश मे थे....! वो तो मैंने चंडिका का अवतार धारण कर लिया...उस बच्ची को दूसरे वार्ड मे ले गयी...स्ट्रेचर पे डाला,तो उसके मुँह पे चद्दर उढ़ा दी...वरना तो इसकी फोटो खिंच जानी थी ...!"

इतना बता के फिर उसने बाकी घटना का ब्योरा मुझे सुनाया...मै भी बेहद उद्विग्न हो गयी..कैसे दरिन्दे होते हैं...और हम तो जानवरों को बेकार बदनाम करते हैं...! जानवर तो कहीँ बेहतर...! पर मुझे और अधिक संताप आ रहा था, उन कैमरा लिए नुमाइंदों पे...! ज़रा-सी भी संवेदन शीलता नही इन लोगों मे? सिर्फ़ अपने अखबारों मे सनसनी खेज़ ख़बर छप जाय...अपनी तारीफ़ हो जाय, कि, क्या काम कर दिखाया ! ऐसी ख़बर तस्वीर के साथ ले आए...! सच पूछो तो इस किस्म की संवेदन हीनता का मेरा भी ये पहला अनुभव नही था...जोभी हो!

मै जिनके घर रुकी थी, रात को वहाँ लौटी तो मेरे मनमे ये सारी बातें घूम रही थीं...सुबह मेज़ पेसे जब अखबार उठाये,तो बंगाल मे घटी, और मशहूर हुई एक घटना का ब्योरा पढ़ने लगी...उस "मशहूर" हुए बलात्कारी को सज़ा सुनाई गयी थी, और चंद लोगों ने उसपे "दया" दिखने की गुहार करते हुए मोर्चा निकाला था...ये ख़बर भी साथ, साथ छपी थी...! दिमाग़ चकरा रहा था....!

इतनेमे मेरी मेज़बान महिला फोन पे बात ख़त्म कर मेरे आगे आके बैठ गयीं और बतियाने लगीं," आजकल रेपिंग भी एक कला बन गयी है..."

मैंने दंग होके उनकी ओर देखा...! क्या मेरे कानों ने सही सुना ?? मेरी शक्ल पे हैरानी देख वो आगे बोली," हाँ! सही कह रही हूँ...हमलोग तो लड़कियों को ये हुनर सिखाते हैं....!"
कहते,कहते वो, अपनी कुर्सी के पीछे मुड़ के बोलीं ," अरे ओ राधा...ठीक से रेप कर...अरे किसन...तुझे मैंने रेप करना सिखाया था ना...अरे ,तू मेरा मुँह क्या देख रहा है...सिखा ना राधा को...करके दिखा उसको...राधा, सीख ज़रा उससे...ठीकसे देख, फिर रेप कर...!"

मेरी तरफ़ मुडके बोली," कितना महँगा पेपर बरबाद कर दिया...! ज़रा मेरा ध्यान हटा और सब ग़लत रेप करके रख दिया...!"

अब मेरी समझमे आने लगा कि, उस बड़ी-सी मेज़ के कुछ परे, एक कोनेमे,( जो मुझे नज़र नही आ रहा था, और पानी चढाने की मोटर चल रही थी, तो कागज़ की आवाज़ भी सुनाई नही दे रही थी), उनके २ /३ नौकर चाकर , कुछ तोहफे कागज़ मे लपेट रहे थे!

उनके पोते का जनम दिन था ! जनम दिन पे आनेवाले "छोटे" मेहमानों के खातिर, अपने साथ घर ले जानेके लिए तोहपे, "रैप" किए जा रहे थे! ! इन मेज़बान महिला का उच्चारण "wrap"के बदले "रेप" ऐसा हो रहा था....और मै अखबार मे छपी ख़बर भी पढ़ रही थी....तथा,पूर्व संध्या को सुनी "उस" ख़बर का ब्योरा मनमे था...उस घटना के बारेमे ख़बर भी वहाँ के लोकल अखबार मे छपी थी..मैंने उसे भी पढा था..ग़नीमत थी,कि, लडकी का नाम पता नही दिया था...! ज़ाहिर था, उन्हें मिलाही नही था...!

लेकिन चंद पल जो मै हैरान रह गयी, उसका कारण केवल मेरे दिमाग़ का" अन्य जगह" मौजूद होना था...वरना, मुझे इन उच्चारणों की आदत भी थी.....!
क्रमश:

( अब वर्तनी को बेहद ध्यान से चेक किया है...कहीँ मेरे लेखन मे भाषाको लेके कुछ "ग़लत फ़हमी" ना उभरे!)

मंगलवार, 2 जून 2009

बोले तू कौनसी बोली ?२

मै मराठी भाषा बचपनसे सीखी...पाठ्शालामे माध्यम भी वही था, जबकि मेरे घरमे हिन्दुस्तानी बोली जाती थी..और लिखत उर्दू या हिन्दुस्तानी मे मेरी माँ तथा दादी बड़ी सहज थीं..., पर बात करनेका ढंग, या लहजा, रोज़ मर्रा की बोलीमे बदल जाता..कभी हैदराबादी भाषाका असर आता( खासकरके मेरी दादीकी भाषापे या फिर गुजराती का )....माँ की भाषा और उच्चारण , हमेशा गुजराती से प्रभावित रहे...वोभी मूल वडोदरा की थीं...दादी खम्बात की....दादाकी भाषा पे गुजराती और बम्बैया हिन्दी, इन दोनोका प्रभाव था। लेकिन "गयेला," कियेला" ऐसे शब्द बोलचालमे हरगिज़ नही आते।

दादा जब अंग्रेज़ी बोलते तो लगता कि , कोई ऑक्स्फ़र्ड मे पढ़ा व्यक्ति बोल रहा है। उर्दू पढ़ते थे, लेकिन बोलनेमे लहजा उसकी नज़ाकत खो देता...उनका येभी इसरार रहता कि, गर हम बच्चे हिन्दुस्तानी मे बोल रहे हों,तो उसमे अंग्रेजीके शब्द नही आने चाहियें! खैर मूल मुद्देपे आती हूँ...

मै स्कूल मे चार भाषाएँ सीखती रही..... चूँकि मेरी मातृभाषा मराठी नही थी, मै और अधिक सतर्कता से उस ओर गौर करती...उसमे मुझे मराठी गीत, या अन्य रेडिओपे होनेवाले कार्यक्रम, इनकी बड़ी सहायता मिली...इतनी,कि, मै हर भाषामे सबसे अधिक अंक प्राप्त कर जाती...मराठीके कुछ गीत जो लताजी के गाये हुए हैं, मै उन्हें ताउम्र भूलही नही सकती...!

अब ज़िन्दगीमे ऐसे मौक़े आए जब मुझे ये भाषा, किसी अमराठी भाषिक को सिखानी पड़ गयी...उनमे मेरे बच्चे तो शुमार थेही..उसके पहले मेरे पती शुमार हो गए...सेवा कालके पहले कुछ साल तो डेप्युटेशन पे गुज़रे...लेकिन जब होम कैडर मे लौटे,तो मराठी का इम्तेहान देना ज़रूरी हो गया....हम लोग ठानेमे थे उन दिनों...समय कम मिलता था, इन्हें सिखाने के लिए...जब कभी, किसी कारन, ठाने से मुम्बई जाना होता ,या फिर जब वापस लौटते, तो मै इनके पाठ शुरू कर देती...उन दिनों पहली बार मुझे समझ मे आया कि, मराठी, देशकी सबसे अधिक क्लिष्ट भाषा है! ! और बांगला सबसे अधिक आसान! ये तो मैंने शुक्र मनाया कि, मराठी और हिन्दी की लिपि देवनागरी ही है...न होती,तो पता नही" मेरा क्या होता(कालिया)?"

अब इस भाषा का व्याकरण मैंने तो ईजाद किया नही था...पर जब कभी इन्हें टोक देती तो ये मुझपे बरस पड़ते...! मानो ये टेढा व्याकरण मेरी ईजाद हो! ख़ैर, किसी तरह पास तो होही गए....वरना तनख्वाह मे बढोतरी रुक जाती!
अब बच्चों की भी बारी आ गयी थी...और हमारी पाठ्य पुस्तकें तो सीधे साहित्य सिखाने चल पड़ती हैं...बोली भाषा नही!

ऐसेही एक शाम याद है...कुछ इनके सहकारी, हमारे घर भोजनपे आए हुए थे। पती पुलिसमे , महाराष्ट्र कैडर के ..पत्नी डॉक्टर...सिविल अस्पताल मे नौकरी करती थीं...उन्हें भी मराठी की परीक्षा दिए बिना चारा नही था..!
जब इनके पती कोल्हापूर मे तबादले पे आए हुए थे, मोह्तरेमा को , अखबारों के मध्यम से मराठी सीखने की सूझ गयी...

बोली," मै सुबह चाय की चुस्की लेते,लेते मराठी अख़बार की हेड लाइन्स पढ़ ने लगी...छपा था," एक दुम जली बस गड्ढे मे गिरी "!( ये वाक्य ,वैसे तो मराठी मे था...यहाँ,पाठकों की सुविधा की खातिर हिन्दी मे लिख रही हूँ..)...
"अब मै हैरान..मैंने अपने अर्दली से पूछा,भैया, ये क्या चक्कर है...हमने हवाई जहाज़की दुमके बारेमे सुन रखा था...अब ये बस की कहाँ से दुम पैदा हो गयी......और पहले दुम जली, फिर वो जाके गड्ढे मे गिरी....!
"मैंने ने जब ये अर्द्लीको पढ़के सुनाया तो वोभी बौखला गया...ऐसी बात उसनेभी कभी सुनी थी ना पढी थी...!"

खैर, उस महिलाने जैसेही वो हेड लाइन सुनायी, मेरा हँसीके मारे बुरा हाल हुआ जा रहा था....लोग मुझे निहार रहे थे,कि, इसे हो क्या गया है,जो इतना अधिक हँसती चली जा रही है...!
मै थी,कि, उन्हीं के मूहसे वो अफ़साना गोई सुनना चाह रही थी...बिना दख़ल दिए...समझ रही थी, कि,किस ग़लत फ़हमी के कारण, ये अजीबो गरीब, और हास्यास्पद प्रसंग उभरा है...

खैर, उन्हों ने आगे सुनाया," मैंने उसे अखबार थमाते हुए कहा, 'देख ये, पढ़ इसे, और मुझे बता के ये क्या चक्कर है...पहले तो बसकी दुम जली और जाके गड्ढे मे गिरी...अर्द्लीने पढ़ा और अपनी हँसी को दबाते हुए बोला,'बाई साहेब, ये लिखा है,"दुमजली" लेकिन इसे मराठी मे पढ़ा जाएगा," दु मजली", मतलब दो मंज़िली...डबलडेकर बस!"

लिखा तो "दुमजली", इसी तरह से जोडकेही जाता है, पढ़ते समय, दु मजली पढा जाता है!

अब सारे मेहमान हँस हँस के लोटपोट होने लगे! !

इस वाक़या के बाद जब कभी मै अपने या किसी औरके बच्चों को मराठी या हिन्दी सिखाती और ग़लत संधि विच्छेद से पढ़ते सुनती, तो मेरा ये "कोड वर्ड"बन गया था..मै कहती रहती," दुमजली, दुमजली."...इशारा होता, अलग, अलग तरहसे संधि विच्छेद करके आज़माओ!!!

एक बार मुम्बई से नाशिक जा रही थी..बोगीमे काफ़ी सारे परिचित मित्र आदि बैठे मिले...बातोंमे बात चली तो मैंने, उन मे से सभी हिन्दी भाषिकों को " दुमजली" ये शब्द ,देवनागरीमे लिखके पढने के लिए दिया...सभीने उसे "दुमजली" ही पढ़ा...और हैरानीसे पूछा, "ये बताओ, पहले, कि, बस की दुम जली और फिर गड्ढे मे गिरी, ये लिखना कुछ ख़ास दर्शाता है क्या....."

जब सही संधि विच्छेद सामने आया तो पूरी बोगी ठहाकों से गूँज उठी....

भाषा भेदसे मैंने लोगों मे ज़बरदस्त मनमुटाव होते देखा है..लेकिन इन संस्मरणों मे सिर्फ़ मज़ेदार किस्से ही बयाँ करूँगी!

अगली बार कुछ और...ऐसे तो पिटारे भरे पड़े हैं!

क्रमश:

रविवार, 31 मई 2009

बोले तू कौनसी बोली..? १

"मेरे घरमे भूत है," ये अल्फाज़ मेरे कानपे टकराए...! बोल रही थी मेरी कामवाली बाई...शादीका घर था...कुछ दिनों के लिए मेरे पडोसन की बर्तनवाली,मेरे घर काम कर जाती...मेरी अपनी बाई, जेनी, कुछ ही महीनों से मेरे यहाँ कामपे लगी थी...उसी पड़ोस वाली महिला से बतिया रही थी......
एक बेटीकी माँ, लेकिन विधवा हो गयी थी। ससुराल गोआमे था..मायका कर्नाटक मे...एक बेहेन गोआमे रहती थी...इसलिए अपनी बेटीको पढ़ाई के लिए गोआ मे ही छोड़ रखा था...

मै रसोईको लगी बालकनी मे कपड़े सुखा रही थी...ये अल्फाज़ सुने तो मै, हैरान होके, रसोई मे आ गयी...और जेनी से पूछा," क्या बात करती है तू? तूने देखा है क्या?"

"हाँ फिर!" उसने जवाब मे कहा...

"कहाँ देखा है?" मैंने औरभी चकरा के पूछा !

"अरे बाबा, पेडपे लटकता है..!"जेनी ने हाथ हिला, हिला के मुझे बताया...!

"पेडपे? तूने देखा है या औरभी किसीने?"मै।

जेनी :" अरे बाबा सबको दिखता है...सबके घर लटकता है...! पर तू मेरेको ऐसा कायको देखती? तू कभी गयी है क्या गोआ?"

जेनी हर किसीको "तू" संबोधन ही लगाया करती..."आप" जैसा संबोधन उसके शब्दकोशमे तबतक मौजूद ही नही था.....!
मै:" हाँ, मै जा चुकी हूँ गोआ....लेकिन मुझे तो किसीने नही बताया!"

जेनी :" तो उसमे क्या बतानेका? सबको दिखता है...ऐसा लटका रहता है...." अबतक, मेरे सवालालों की बौछार से जेनी भी कुछ परेशान-सी हो गयी थी..

मै:" किस समय लटकता है? रातमे? और तुझे डर नही लगता ?" मेरी हैरानी कम नही हुई थी...वैसे इतनी डरपोक जेनी, लेकिन भूत के बारेमे बड़े इत्मीनान से बात कर रही थी..जैसे इसका कोई क़रीबी सबंधी, रिश्तेदार हो!

"अरे बाबा...! दिन रात लटकता रहता है...पर तू मेरे को ऐसा क्यों देख रही है? और क्यों पूछ रही है...?ये इससे क्या क्या डरने का ....?" कहते हुए उसने अपने हाथ के इशारे से, हमारे समंदर किनारेके घरसे आए, नारियल के बड़े-से गुच्छे की और निर्देश किया!
जेनी:"मै बोलती, ये मेरे घरमे भूत है...और तू पूछती, इससे डरती क्या??? तू मेरेको पागल बना देगी बाबा..."

अब बात मेरी समझमे आयी.....! जेनी "बहुत" का उच्चारण "भूत" कर रही थी !!!

उन्हीं दिनों मेरी जेठानी जी भी आयी हुई थीं..और ख़ास उत्तर की संस्कृति....! उन्हें जेनी का "तू" संबोधन क़तई अच्छा नही लगता था....!देहली मे ये सब बातें बेहद मायने रखतीं हैं...!
एक दिन खानेके मेज़पे बैठे, बैठे, बड़ी भाभी, जेनी को समझाने लगीं....किसे, किस तरह संबोधित करना चाहिए...बात करनेका सलीका कैसा होना चाहिए..बड़ों को आदरवाचक संबोधन से ही संबोधित करना चाहिए...आदि, आदि...मै चुपचाप सुन रही थी...जेनी ने पूरी बात सुनके जवाबमे कहा," अच्छा...अबी से ( वो 'भ"का भी उच्चारण सही नही कर पाती थी) , मै तेरे को "आप" बोलेगी.."

भाभी ने हँसते, हँसते सर पीट लिया....!
जेठजी, जो अपनी पत्नीकी बातें खामोशीसे सुन रहे थे,बोल उठे," लो, और सिखाओ...! क्या तुमभी...१० दिनों के लिए आयी हो, और उसे दुनियाँ भर की तेहज़ीब सिखाने चली हो!!!!"

क्रमश:

( शायद मेरे अज़ीज़ पाठक, जो मुझे कुछ ज़्यादाही गंभीर और "दुखी" औरत समझने लगे थे, उनकी कुछ तो "खुश" फ़हमी या "ग़लत" फ़हमी दूर होगी...असलियत तो ये है,कि, मै बेहद हँसमुख हूँ... और शैतानी के लिए मशहूर हूँ...अपने निकट परिवार और दोस्तों मे! )

शुक्रवार, 8 मई 2009

नेकी कर कुएमे डाल ! ३

नेकी और पूछ, पूछ...! इस उक्तीके साथ मै ज़िन्दगीमे बढ़ती चली गयी....बिना किसीके कहेही चुपचाप काम कर देना मेरी आदतसी बन गयी थी...और कुएमे तो डालही देती थी...! कई बार कोई मुझे याद दिला देता," तुमने हमारी "उस" समय बेहद मदद कर दी...वरना पता नही क्या हो जाता॥!"
सुनके मै कुछ देर सन्न-सी रह जाती, क्योंकि मुझे क़तईभी याद नही आता की, मैंने कौनसी मदद कर दी थी? खैर..

जब हम उस शेहेरमे पोहोंचे ही थे, तब उसने अपने बच्चों के बारेमे अपनी तम्मनायें मुझसे कहीँ...बेटा तो केवल दो सालका था...! पहले तो वो उसे वो पता नही क्या बनाना चाह रही थी, लेकिन, मेरे पतीसे मुलाक़ात होनेके पश्चात उसके मनमे घर कर गया," इसे तो एक IPS अफसरही बनाना है..."

बड़ी बेटीको मेडीसिन मे दाखल करना है...जबकि, वो मेरीही बेटीके क्लासमे थी..५ वी की...! इसलिए क्योंकि, उसकी जेठानी, जो स्वयं एक आर्किटेक्ट थी, वो चाहती है...
हैरत तो ये थी कि, ये मेरी सहेली साडियाँ तक उसकी जेठानी की पसंदकीही पहेनती थी! वजेह ? जेठानी मुम्बईमे रहती थी..मुम्बई तो अत्याधुनिक परिधानों की नगरी कहलाती है...! मेरी देखा देखी उसने अपना वस्त्रोंका चुनाव तो बदल दिया...कहीँ ना कहीँ, उसपे इस बातका प्रभाव पडा कि, मुझे किसीभी "लेटेस्ट" परिधानमे कभी कोई रुची ना पहले रही ना तब थी...नाही मुझे वस्त्रों की कीमत असर करती...
हाँ...उसे वस्त्रों की कीमत की ज़रूर हमेशा परवाह रही...

बीछ्वाली बेटीको वो टीचर बनाना चाहती थी...कि उसके बाद स्कूलकी धरोहर वो उस बेटीको सौंप देगी...
बड़ी बेटीको उसने हर तरीकेसे ,हादसे ज़्यादा छूट दे रखी थी...१४ सालकी उम्र सेही वो टूवीलर चलाती रही...पोशाख भी, उसके, उस शेहेरके हिसाबसे बेहूदा होते थे...वो शिकायत करती," मुझे इस शेहेर की मानसिकता नही अच्छी लगती...सड़क पे सब मुझे घूरा करते हैं.."
इस बातका मैंने कभी जवाब देना उचित नही समझा....

एक दिन इस सहेलीने मुझे कहा," जानती हो मेरी बड़ी बेटी क्या बनना चाहती है? फ़िल्म अभिनेत्री ...! मेरी जेठानी सुनेगी तो क्या कहेगी? तुम्हें क्या लगता है, मैंने इसे किस तरह से परावृत्त करना चाहिए?"
" तुम सचमे मेरी सलाह जान लेना चाहती हो?" मैंने पूछा...
" और नही तो क्या...? इसीलिये तो पूछ रही हूँ..?उसने उत्तरमे कहा।
" तो फिर उसे परावृत्त करना छोड़ दो..अभी तो वो केवल ५ वी कक्षामे है...कह दो उसकी, अपनी पढ़ाई तो पूरी करे..कमसे १२ वी कक्षा तक...फिर देख लेंगे...और वैसेभी, गर वो एक अभिनेत्री बनना चाहती है तो उसमे बुरा क्या है? अभिनयमे जिनका सानी नही नही, ऐसी मिसालें हैं हमारे सामने...और अगर चरित्र को लेके परेशाँ हो,तो, वो तो उसके अपने ऊपर निर्भर है...जबतक वो नही चाहेगी, उसे कोई बहका नही सकता...और ये बात किसीभी पेशेसे संलग्न नही..फिल्मों मेभी ऐसी मिसालें हैं, जहाँ नायिकायों ने बेहूदा वस्त्र पेहेंनेसे इनकार किया है..येतो, बुरा ना मानो, अभीसे पेहेन लेती है!...."
जब उसकी ये बेटी ८वी कक्षामे आ गयी, उसे, उसकी जेठानीकी कहने परसे, एक बडेही मशहूर international स्कूलमे भरती करा दिया...
अब बीछ्वाली बेटी भी ज़िद करने लगी,कि, उसकी बेहेन जा सकती है, तो वो क्यों नहीं? अब इसने पैसोंका किसी तरह जुगाड़ कर उसेभी भेज दिया...लेकिन वो लडकी कुछ ही दिनोंमे लौट आयी...
बड़ी बेटीके १० वी कक्षामे पोहोंचते पोहोंचते, उसपे सेरामिक डिजाइनर बननेका भूत सवार हो गया...और सच तो ये है,कि, वो बनभी गयी..फिलहाल UK मे स्थायिक है..!उसने एक अँगरेज़ लड़केसे ब्याह्भी कर लिया...!
मँझली बेटी आज एक मशहूर विमान सेवामे एयर होस्टेस है...और मेरी सहेलीको इस बातका बेहद अभिमान है....ये लडकी जब मुम्बई मे अपनी पढाई कर रही थी...तब एक पग की हैसीयतसे रह रही थी...बादमे मेरी सहेलीको कई बातें पता चलीं...अपनी बेटीके चालचलन को लेके...पर उसे समझा बुझाया गया ,तो,वो सही राह्पे आभी गयी...
बेटा पायलट बन गया है..US मे स्थित है..
चलो, ये तो बादकी बातें हुईं...

मेरी ये सहेली, हमेशा किसी ना किसीसे परेशाँ हो मेरे पास दौडे चली आती...हमारा घर ( या कहिये..हमारे घर, क्योंकि उस शेहेरमे ४ अलग,अलग मकान बदले गए....मेरे पतीके २ तबादले उसी शेहेरमे हुए...)हमेशा उसकी स्कूल तथा उसके घरके पासही हुआ किया...सिर्फ़ एकबार छोड़, जब हमें चंद महीने किरायेके मकानमे रहना पडा....

उसकी हर बात मै खुले मनसे सुन लेती...कई बार अन्य लोगोंसे पंगेभी ले लेती...उसे हरसमय येभी शंका रहेती,की, कोई ना कोई उसका फायदा उठा लेता है..दूसरी ओर येभी कहती,कि, वो चाहे किसी समारोहमे जाय, लोग उसीके इर्दगिर्द हो जाते हैं...वो इतनी हरदिल अज़ीज़ है...! जानती थी,कि, ये उसका यातो बचपना है, या कहीँ अपने मनही मन असुरक्षित महसूस करती है..

उसे येभी गुरूर था,कि, उसे कोईभी भारतीय संगीत या नृत्य, या कला पसंद ही नही...नाही उसके पतीको...इसमे चाहे किसीने उसके स्कूल के समारोह के आयोजनोंमे कितनीही मदद क्यों ना की हो, वो उस व्यक्ती के किसी ऐसे समारोहमे जाना अपने शानके ख़िलाफ़ समझ लेती...मै जाती तो मेरे साथ चलीभी आती...आयोजनके स्थलपे पोहोंच, उसे फिर वही गुरूर रहता कि, देखा, सब कितना मेरेही करीब आना चाहते हैं...पता नही मुझमे कुछ हैही ऐसा जो लोग खिंचे चले आते हैं..

इन सब बातोंको सुन लेनेकी मुझे आदत हो गयी थी...और सुनके ना मुझे खिज होती ना, नाही बुरा लगता...वो जैसी थी, मैंने उसे वैसाही स्वीकारा था...और उसके गुन अवगुण जोभी थे, उसमे उसके चरित्र को लेके कोई छींटा कशी नही कर सकता था...उसपे कईयों ने ये इलज़ाम भी लगाया कि, वो, स्कूलमे प्रवेश देते समय अनुदान लेती है...मै जानती थी, ये सच नही था...ये इलज़ाम उन्हीं लोगों ने लगाये, जिनके बच्चों को एक विशिष्ठ संख्याके कारण किसी वर्गमे प्रवेश नकारा गया...

खैर...हमारा कभी तो तबादला होनाही था...हो गया...बंजारों की ज़िंदगी बिताते रहे...हमारे मुम्बई मे रहते, रहेते,समाचार मिला कि, उसके भाईकी ह्त्या कर दी गयी...ह्त्या उसके भाईके रहते घरमेही हुई...रातमे हुई...घरके व्यक्तियों के अलावा कोई अन्य घरमे आया हो, इसका सबूतभी नही था...
घरमे रहनेवाले व्यक्ती थे, केवल उस भाईका अपना बेटा और उसकी पत्नी...लेकिन, कुछ दिनों बाद केस रफा दफा हो गया...इस भतीजे को इस सहेलीने काफ़ी प्यारसे अपने घर बुला बुलाके पढाया भी था...जब वो लड़का स्कूलमे था....लेकिन बादमे उसने पढ़ाई छोड़ दी...अपने पिताकी ही तरह, वो "अन्य" कामों को लेके मशहूर रहा....

उन कामों को मै कलमबद्ध नही करूँगी...यही बेहतर होगा...जिन राजनेताओं के साथ उस परिवारका उठना बैठना था, उनके बारेमेभी नाही लिखूँ तो बेहतर...लेकिन ये सब जानते हुएभी मैंने उसका साथ देना नही छोडा...
मुम्बईकी पोस्टिंग मे जब हमलोग थे, उसके पिताका निधन हो गया...उसके पूर्व उनपे किसीने प्राणघातक हमलाभी किया था...US बातका भी कभी पता नही चल सका कि, क्यों और किसने...उनकी म्र्युत्यु तो दिलके दौरेसे हुई....
मुम्बईके पोस्टिंग मेही रहेते, उसके जेठानी, जो बेहद तेज़ रफ़्तार वाहन चालक थी, उसके हाथसे एक भयानक हादसा हो गया..जिसमे सहेलीके ससुर की म्र्युत्यु हो गयी...जेठानी ख़ुद कई महीनों अस्पतालमे पड़ी रही...ये हादसा पुनेमे हुआ...

इस सहीलेने और उसके पतीने अपना एक छोटा-सा फार्म हाउस भी बना लिया...साधारणतः, मै बिना पूछे किसीको सलाह मशवेरा देतीभी नही...उसने मुझे फार्म हाउस का नक्शा बताया...ज़ाहिर था,कि, आर्किटेक्ट मुम्बई काही होना ज़रूरी था...US छोटे शेहेर मे कौन इतना क़ाबिल था? जब नक्षेको लेके उसने मेरी राय जानना चाही,तो मैंने सिर्फ़ इतनाही कहा," नक्शा तो बेहद अच्छा है, लेकिन ये जो "स्प्लिट लेवल" है, मुझे ज़रा खतरनाक लग रहा है..."

उसका उत्तर था," लेकिन येतो बेहद मामूली है...और वैसेभी मुम्बईके आर्किटेक्ट अपनीही चलाते हैं...और मुझे तो ये सुंदर लग रहा है...यहाँ पे रेलिंग आ जायेगी...एक "विला" की तरहसे लगेगा..."

उस घरकी "हाउस warming" के समारोहमे तो मै नही जा पायी..लेकिन उसी दिन, उसकी माँ, जो एक कैंसर की मरीज़ थी, स्प्लिट लेवल के कारण बड़ी जोरसे पटकी खाके गिर गयी...और कई जगह हड्डियाँ टूट गयीं...पिताके निधनके बाद, अपनी माँ की देखभाल इसीके ज़िम्मे थी...

इन सब झमेलोंके चलते हमारा विदर्भ मे तबादला हुआ...मेरी बेटी US चली गयी... उसे छोड़ हम हवाई अड्डे से मुम्बई की पुलिस मेसमे लौट रहे थे...... मैंने अपने पतीसे, एक जान पहचानके अफसरको, जो हमें अपने माता पिताका दर्जा देता था, सिर्फ़ इतना फोन करनेके लिए कहा,कि, इस महिलाको कमसे कम तकलीफ ना पोहोंचे, इस बातका ध्यान रखा जाय....( भाई की ह्त्या को लेके या स्कूलके अन्य झमेलों को लेके)....
विदर्भ लौट जानेसे पूर्व मै उसे मिलभी आयी....येभी सच था,की, कई लोग मेरे उस शेहेरसे दूर जानेके इन्तेज़ारमे थे...अपनी खुन्नस निकालनेके लिए...

अपनी अपनी ओरसे हम दोनों हमारी दोस्ती निभाते रहे....लेकिन अबतक येभी सच था,कि, उसपे अपनी दोस्ती, मेरे प्रती, सही मायनेमे साथ खड़े हो, निभानेका प्रसंग आयाही नही था...मुड़ के देखती हूँ,तो लगता है, जैसे मुझे मेरे कुछ अन्य मित्र गण कहते थे, ये बात तो मैनेही करके दिखायी थी...पर मुझे उस बातका ना कोई गुरूर था, ना गिला, ना एहसास...
एहसास तो तब हुआ हुआ, जब उसने कही एक बात मेरे कानों तक पोहोंची...खैर!! अभी उस बातके करीब आनेमे समय है...उसके पूर्व काफ़ी कुछ हुआ...उसके जीवनमे.....हुआ तो मेरेभी, लेकिन उसका प्रभाव मेरी सहेलीपे नही पडा...
हमारे विदर्भ मे रहते, एक और ज़बरदस्त आघात उसपे हुआ......मेरी दख़ल अंदाजी एक तरहसे खतरेसे खाली नही थी.....नाही मैंने की...लेकिन एक मकामपे आके मुझे दख़ल अंदाजी तो नही, लेकिन उसका साथ अवश्य निभाना पडा...और बडीही शिद्दतसे मैंने निभाया....जब आधेसे अधिक शेहेर उससे दूर रहेना चाह रहा था...मैंने खुलेआम उसका साथ निभाया...

क्रमश:

नेकी कर कुएमे डाल..२

हमारी ज़िंदगी बीतती रही...बोहोत करीब रहे हम दोनों...उसके बचपने के कारण कई बार उसे परेशानी उठानी पड़ती...और मै हर हाल मे उसके साथ हो लेती...
उतार चढाव तो मेरे जीवनमे भी शामिल थेही...
छ: साल उस शेहेरमे गुज़रे.....हर साल हम हमारी दोस्तीकी सालगिरह याद कर लेते....आज उस बातको २१ साल हो गए हैं...

उस दौरान कई हादसे उसके जीवनमे हुए...कई परेशानियाँ खडी हुई..कई अधिकारियों ने उसे अपने अधिकार के तहेत बेहद सताया...मुझे कभी नही लगा, की, उसका साथ देनेमे मै कुछ ख़ास कर रही हूँ...या जब दुनियाँ जानती है,कि, मै उसके साथ हूँ , तो उसके क्या परिणाम हो सकते हैं...और उसने हमेशा कहा,कि, गर मै उसके साथ ना होती, तो वो कबकी टूट चुकी होती..उसके अपने बेहेन बहनोई, भाई ...सभीने उसे हरवक्त सतायाही सताया...

स्कूलकी कई टीचर्स एक ईर्षा के तहेत बोहोत बार मेरे बेटेकी शिकायत लेके उसके पास पोहोंच जातीं...
बड़ी मज़ेदार आदत थी/और आजभी है, मेरे बेटेको...जब वो किसी चीज़मे डूबा हुआ होता है...चाहे पढ़ाई हो, क्लास रूम का लेक्चर हो या, टीवी पे कोई कार्यक्रम...अपने मूहमे ज़बान इस्तरह्से घुमाता है, जैसे कुछ खा रहा हो...
एकबार इस सहेलीने मुझे अपने स्कूलमे बुलाया और कहा, कि, उसे मेरे बेतेसे शिकायत है..कि उसकी टीचर्स को भी शिकायत है...
मेरे पूछ्नेपे उसने मेरे बेटे तथा टीचर्स को अपने दफ्तर मे बुलाया। टीचर ने मुझसे कहा," ये क्लास मे हरवक्त कुछ खाता रहता है। जब उसे पूछा जाता है,तो, निगल जाता है। और ना "सॉरी" कहता है ना कुछ...बस, मेरे मूहमे कुछ नही था, इसी एक बातको दोहराता है..."
मै हँसने लगी...और कहा," सच तो यही है...उसके मूहमे कुछ नही होता..उसे मूह्के अन्दर ज़बान घुमानेकी आदत है..और जब ना मै उसे कोई स्वीट्स देती हूँ, ना पैसे, तो वो रोज़,रोज़ क्या खा सकता है?"
मुख्याध्यापिका ने कहा," नही, ये सच नही है..मैंने ख़ुद उसे अपने दफ्तर मे बुलाया था...उसवक्त कुछ लोग मुझे मिलने आए हुए थे..मैंने इसे एक कोनेमे खड़ा रहनेके लिए कहा...उसे दो तीन बार देखा...वो अपने मूहमे कुछ रखे हुए था, उसे चूसता जा रहा था...जब मैंने उसे अपने सामने खड़ा करके मुँह खोल्नेको कहा तो उसने मुँह खोला..कुछ नही था, और जब मैंने उसे डांटा,कि, सच कहो, क्या सटक गए, उसने सिर्फ़ मुस्कुरा दिया...इसकी इतनी मजाल? कि अपनी मैडम के आगे, इतना मगरूर? सिर्फ़ मुस्कुरा देता है? जवाब नही दे सकता? सच नही बता सकता"?
वो तमतमा गयी थी।
मैंने कहा,"अपनी सहेलीसे भी( जो उस वक्त मेरे बेटेकी मुख्याध्यापिका थी), और टीचर सेभी भी," गर आपको ऐसा लगता है,कि, वो कुछ खा रहा, है,तो मै, इसके आगे कुछ नही कहूँगी...आपके नियमों तहेत जो वाजिब हो, वो सज़ा उसे देदें...मुझे कोई ऐतराज़ नही..."

खैर! मनही मन मुझे अफ़सोस हुआ कि, बच्चा सच कह रहा था, लेकिन उसे झूठा ठहराया जा रहा था.....

उस घटनाके कुछ रोज़ बाद हमारे यहाँ भोजनका आयोजन था। मेरी सहेली और उसके पती भी आमंत्रित थे। अचानक मुझे अपना बेटा दिखा, जो दूसरे कमरेमे एक टीवी प्रोग्राम देख रहा था...मैंने मेरी सहेली की और इशारा किया और उसे उस कमरेमे ले गयी। बेटा अपनेआपमे मगन था। मैंने सहेलीको दिखाया," अब देखो, इसका मुँह...और कहो अभीके अभी खोलनेको..."
उसने क्या, मैनेही अपने बेटेसे पूछा," तुझे भूक लगी है? कुछ खायेगा? "
बेटेने जवाब दिया," माँ! मै क्या खा सकता हूँ? भूक तो लगी है, लेकिन मुझे परोस दो, वरना तुम फिर कहोगी कि, तुमने ठीकसे नही परोसा ....इधर उधर गिराया...!"
मेरी सहेलीने गौर किया कि, ना तो उसने अपने मूहमेसे कुछ सटक लेनेका यत्न किया, नाही उसके मूहमे कुछ था...खैर उस दिनतक वो इस बच्चे को ना जाने कितनी बार सज़ा दे चुकी थी...उसका इसबार कमसे कम मेरी और उसकी, दोनोकी सच्चाई पे विश्वास तो हुआ...
मेरे पतीको एक दिन हँसते हँसते मैंने ये क़िस्सा सुनाया तो वो कह बैठे," बड़ी अजीब औरत है ये...तुम उसके लिए इतना कुछ करती रहती हो और तुम्हारी इस बातपे उसका विश्वास नही था? वो अपने टीचर्स को खुश करना चाहती थी? एक बेगुनाह बच्चे के ज़रिये?"
उनकी बात सही थी, लेकिन मैभी सही मौक़ेके तलाशमे थी। स्कूलके अधिकार और नियमोंमे दख़ल अंदाज़ी किसीभी हालमे नही करना चाहती थी।
क्रमश :

सोमवार, 4 मई 2009

नेकी कर कुएमे डाल...! १

वैसे तो इस कहावत की पुष्टीकरण के लिए किस्से हजारों मिल जायेंगे ...और एक मैही नही सभीके पास होंगे....!

लेकिन कुछ ऐसे वाक़यात हैं, जिन्हें मै शायदही भुला पाउंगी....अचरज भी होता है...और फिर सोचती हूँ....मैंने इन व्यक्तियों को वैसेतो शुरुसेही जाना था...कि इनकी असलियत क्या होगी...लेकिन हमेशा यही मानके चली, कि ऐसा कौन मिलेगा जिसमे कुछ न कुछ ना खामियाँ ना हों? और हरेक रिश्ता एक क़ीमत के साथ ही आता है...हम दोस्तीको बेहद निष्कपट और पावन एहसास मानते हैं...लेकिन उसे निभानेकी ज़रूरत होती है...ऐसा नही कि, हमने जब चाहा अगला हाज़िर, वरना हम उसे भुलाए रखें...अन्य रिश्तोंकी तरह, इसेभी हमें अपने प्यार और स्नेह्से सींचना ही होता है...बेहद एहतियात बरतनी होती है...और ये एक रिश्ता ऐसा है,कि, ज़रासीभी लापरवाही बर्दाश्त नही कर पाता...कोमल पौधेके तरह...

जब मै अपने अंतरमे झाँक के देखती हूँ,तो पाती हूँ, कि, मैंने अक्सर ऐसे रिश्ते बेहद मेहनतसे निभाएँ हैं....और अपनी पीठ थपथपाने के लिए नही कह रही...वरना अपने बारेमे अन्य सत्य मान लिए , मै इसेभी मान लेती...

सबसे प्रथम, अपनेआपको तकरीबन २१ साल पहले ले चलती हूँ....जब मेरी वाकफ़ियत एक महिलासे हुई...वो महिला थी मेरे बच्चों के स्कूल की मुख्याध्यापिका....बस तभी हम उस शेहेरमे पोहोचे थे....बच्चों के प्रवेशके ख़ातिर मै उसके साथ मिली। बच्चों ने प्रवेशके लिए जो ज़रुरियात थे वो पूरे किए...जैसे गणित और इंग्लिश की लिखत परिक्षा।
वैसे मुझे इशारतन कहा गया कि, इस स्तर के अधिकारियों के बच्चों को, जो तबादले पे आते हैं, स्कूलों को प्रवेश देना बंधनकारक होता है...प्रवेश के समय कोई परीक्षा नभी दें तो चलता है। खैर, मै इन बातों मे नही विश्वास रखती थी...गर इतना गुमान है तो फिर ऐसेमे अफसरों ने सरकारी स्कूलोंमे अपने बच्चों का दाखिला करा लेना चाहिए।

सौभाग्यवश, मेरे दोनों बच्चे आसानीसे दाखिला पा गए।

मुख्याध्यापिका हँसमुख थी...थोड़ी बालिशभी...पर जैसे मैंने कहा, हरेकमे कुछ न कुछ स्वभाव विशेष होतेही हैं...उसमे ये था..अन्य गुण भी थे...अपनी स्कूलके हर बच्चे को वो नामसे जानती थी। येभी था,कि, अपनी हर विशेषता उसे ज़ाहिर करनेकी इच्छा रहती। अपनी ओर ध्यान हरवक्त आकर्षित करना उसे हमेशा अच्छा लगता...शायद एक बच्चे की तरहसे...कभी कबार मेरी बिटिया इस बातसे काफ़ी चिढ -सी जाती...उसे लगता, मैडम हमेशा अपनेही बच्चों के बारेमे बात करती रहती हैं...या फिर बड़े फख्र से वो बताती कि, उसे आजभी गुडियों से खेलना पसंद है..पलभर मुझेभी ज़रा अजीब-सा लगा..लेकिन पल भरही ...उसने जैसेही मुझसे कहा," जानती हो, मुझे लता कहती है कि, मै अपरिपक्प हूँ ! "
मैंने झटसे उत्तर दिया," हम सभीमे कुछ ना कुछ बचपना होताही है...कुछ उसपे परदा डाले रखते हैं, कुछ नही डाल पाते...!"

हम दोनोकी दोस्ती के चर्चे उस स्कूलसे बाहर निकल उस शेहेरमेभी मशहूर हो गए। शेहेर कोई महानगर तो था नही...और येभी हुआ कि, हमने अपने बच्चे उस स्कूलमे डाले...जबकि, उससे पूर्व हरेक अधिकारीके बच्चे एक अन्य स्कूलमेही डाले जाते...उस सालके बाद ये प्रथा बदल गयी...सभी उसी स्कूलमे प्रवेश पानेकी ख्वाहिश रखने लगे...और वो महिला स्कूलको अपने एक अपत्य के नज़रसेही देखा करती...

स्कूल उसीके पिताकी ओरसे शुरू की गयी थी। शादीके बाद वो मुम्बईमे बस गयी थी। इतनाही नही, उसकी स्कूली और महाविद्यालयीन पढ़ाई भी मुम्बईमे हुई थी। उसके पती एक बैंक मे कार्यरत थे। जब ये स्कूलकी शुरुआत हुई तब कोई अन्य महिला मुख्याधिपिका बनी। बादमे पता चला कि, उसके पास कोई सही कागजात नही थे, जो, उसकी पढाई कितनी हुई और कहाँ हुई इस बातको बताये...! खैर...! उसे निकालें तो पर्यायी तौरपे दूसरा कोई होना ज़रूरी था...
मेरी इस सहेलीने Be.Ed. किया हुआ था...अपने पिताकी स्कूल मे मुख्याधिपाका बन जानेके बाद उसने M.Ed भी कर लिया।

मुम्बई छोड़ आनेके बाद उसके पतीने, उसी स्कूलमे, बिना वेतन, गणित और शास्त्र विषय पढ़ने शुरू किए। उसे अपने बैंक की नौकरी छोड़नी पड़ी। सहेलीके पिताकी शराबकी दुकान थी। उसका एक भाईभी था, जोकि, उसी शेहेरका बाशिंदा था। उसके इर्द गिर्द जिन लोगों का उठना बैठना था, उस बारेमे मै कुछ ना कहूँ तोही ठीक होगा। अपने परिवारसे उसका कमही नाता रहा था।

एक बेहेन थी, जो मुम्बईमे C.A. थी...उसके जीजा, एक बड़ी मल्टी national कम्पनीमे कार्यरत थे। उन्हें स्कूलके boardpe लिया गया था। बल्कि, वो चेयरमैन थे।
एक समय ऐसा आया...उसी साल, जिस साल हम उस शेहेरमे आए...जब पिताकी जायदाद के बंटवारे की बात सामने आने लगी। सहेलीके पतीको अपनी पत्नीके कामके कारण अपनी बैंक की नौकरी छोड़ देनी पड़ी थी। वो उसी स्कूलमे बिना वेतन अपनी सेवायें दे रहा था। खैर मुद्देकी बातपे सीधे आ जाती हूँ। वो शराबकी दुकान उसके नामपे होना ज़रूरी था, वरना उसकी उपजीविकाका क्या साधन होता? मैंने ये बात उसके पिताको बडीही शिद्दतके साथ समझायी...जबकि, बाप बेटीमे तकरीबन बोलचाल बंद हो गयी थी। दुकान उन्हों ने उसके नामपे कर दी...ये बातभी मान ली, कि, गर शायद मै दख़ल नही देती वो इस ओर गौर नही करते...
क्रमशः

शनिवार, 2 मई 2009

क्यों होता है ऐसा? ३

जब भी अपनेआपको खोजती हूँ..अपने साथ मेरे अपनों को भी बेनकाब होते देखती हूँ...जबभी झाँकती हूँ अपने अतीतमे, साथ मेरे चेहरेके और कई चेहरोंको आईना दिखा देती हूँ...यकीनन, ये इरादतन नही होता...ज़ाहिर है, उन हालातोंमे, उन लमहोंमे, जोभी मेरे साथ मौजूद रहा होगा, उसका प्रतिबिम्ब साथ मेरे, नज़र आही जायेगा...

उम्र और अनुभव दुनियादारीकी रस्मे सिखाते गए...सिर्फ़ किसीके लिए दुनियादारी सही होती, वही किसी औरके नज़रमे ग़लत साबित होती...इस कश्मोकशने मुझे हमेशा घेरे रखा...

आज वही, जिन्होंने मुझे झूटके पहले पाठ दिए, मुझसे पता नही किस,किस बातकी जवाबदेही माँगते हैं....कुछ तो इस दुनियासे चल बसे हैं...उनके बारेमे तो कुछभी कहना लिखना, ठीक नही होगा...सिर्फ़ गर मेरे कथ्यके सफरमे वो आके खड़े होंगे तो बस, उस एक घडीको छूके निकल पडूँगी...और क्या कहूँ?

आज सीधे उसी बातपे आ जाती हूँ, जिसने मुझे पिछले कुछ सालोंमे कई बार कट्घरेमे खड़ा किया...ऐसा नही,कि मै कट्घरोंसे बाहर थी...लेकिन एक और इलज़ाम, मेरे माथे आ गया......

मै अस्पतालमे भरती थी....कोई परिवारवाला साथ तो नही हो सकता था हरसमय...बेटी अमरीकामे था...बेटा बस तभी, पंजाबसे मुम्बई आ गया था...हर कोई अपने काममे मगन...सभीको अपना काम एहेम लगता...काम तो मैभी करती, लेकिन घरसे, कोई दफ्तर तो नही था...बेहद एकांत रहता..

सरका दर्द बेइंतेहा बढ़ता जा रहा था...और उसका कारण चंद महीनों बाद पता चला...एक डॉक्टर ने ग़लत दावाई दे दी थी...जबकि उसके कंटेंट मुझे रास नही आते थे, ये बात मैंने पहलेही स्पष्ट की थी...लेकिन दवायीका नाम अलग था तो मै तब समझ नही पायी...जब समझमे आया, तबतक हदसे ज़्यादा नुकसान हो चुका था...
ऐसेही एक भयंकर attack के चलते मुझे अस्पतालमे दाखिल करा दिया गया...

मेरे एक अन्य डॉक्टर ने जो दूसरे शेहेरमे रहेते हैं, मुझसे एक टेस्ट करवा लेनेको कहा था...contrast dye test या कुछ ऐसाही नाम था उसका...अस्पतालमे मेरे लगातार कुछ न test चलही रहे थे...अक्सर ऐसे मौकोंपे मै अकेलीही होती...करवा आती test...कई बार तो मुझे ऑपरेशन थिएटर मे जाके पता चलता की,ये अंडर LA कराया जायेगा याG Aके तहेत!
जोभी था...ये टेस्ट्स का तांता बना हुआ था...contrast dye की testkee reportme लिखा था, "संशयास्पद है"...ओपन MRI एकबार फिर करना होगा....पता नही मुझे क्या सूझा...मैंने वो रिपोर्ट छुपा दी....मेरे बेटेको एक रातमे, जब वो मेरे पास अस्पतालमे रुकने आया तो मैंने, बिना सोचे समझे कह दिया," डॉक्टर को लगता है, ब्रेन मे कोई ट्यूमर है.."

सच तो ये थाकि, मै उसका अपनी और ध्यान खींचना चाह रही थी..."उसे सेविंग करनेको कहो", ये बात अपने पतीसे लगातार सुनती जा रही थी...और वो कर नही रहा था...मनमे अजीब, अजीब ख्याल आते थे..जो अपना मन सोचता है,वो शायद दुश्मनभी नही सोचता...कहाँ खर्च कर रहा है ये जो सेविंग हो नही रही...? रहना खाना, सबतो फ्री था...हमारे साथ रह रहा था...

उसने जैसेही ये बात सूनी, वो बेहद गंभीर हो गया..लेकिन मेरा एक प्लान था...मेरे ओपन MRI टेस्टके होतेही मै सबकुछ नॉर्मल है, कह देनेवाली थी....उससे बड़ी इल्तिजा की, के ये बात और किसीसे ना कहना....लेकिन नही...उसने मुझे अल्टीमेटम दिया, कि यातो मै होके कहूँ, अपनी बेटीको या, वो कह देगा...उससे पहले उसने मेरे health issuarance पॉलिसी बनवा ली...मै रोकती रही, कि रिपोर्ट्स आ जाने दे...लेकिन नही...इस बातकी मुझे खुशीभी हुई,कि उसे मेरी कुछ तो चिंता है...खैर...और एक बडीही खुदगर्ज़ बात मेरे मनमे आयी....गर बिटियाको बताती हूँ, तो देखती हूँ, कि क्या वो अमरीका छोड़ अपनी बीमार माके पास आ सकती है? क्या भारतमेही जॉब ले सकती है?

बेटीको मैंने बेह्द्ही सहज भावसे लिखा...येभी कि बस दो दिन हैं, बात साफ़ हो जायेगी...ओपन MRI हो जाने दो...तबतक चिंता मत करो...अपने पिताको तो बिल्कुल मत बताना...उनपे पूरे महाराष्ट्रकी ज़िम्मेदारी है...ऐसा नहीकि, ऐसी पोस्टपे रहे लोगोंके परिवारों मे ऐसी बीमारियाँ ना हुई हो..और दिल तो करता था, कि सहीमे ऐसा कुछ निकले...मर्ज़ का निदान तो हो...अक्सर लोगोंसे यही सुनती," अरे सर दर्द तो है..ठीक हो जायेगा..."
किसे, किसे बताती कि, मुझे जैसा दर्द होता है, उसे जब कोई देख लेता है तभी,उसकी इन्तेहा या पीडा समझ पता है...

लेकिन बिटियाने हर मुमकिन जगह फोन कर दिए...मेरी बेहेनको मालूम पड़ा तो, उसने और मेरी माँ ने छानबीन शुरू कर दी...खैर रिपोर्ट हाथमे आ गए और मैंने सभीको कह दिया,कि भगवानके लिए अब इस बातको पीछे छोडो...एक शंका थी...मैंने उसका अपनी हताशामे फायदा उठाना चाहा...चाहा,कि, परिवार एक सूत्रमे बँधे...चाहे, मुझे कोई छोटी मोटी सर्जरी ही करनी पड़े....

लेकिन ये, बडीही भयंकर भूल हो गयी...मै सबसे औरभी दूर हो गयी...मैंने कैसी हताशामे, अकेलेपनमे, ये निर्णय लिया, मैही जानूँ...कोई स्पष्टीकरण नही....सर आँखोंपे ये इल्जाम ले लिया...हजारों बार माफी माँग ली...

लेकिन वो दिन है और आजका...मुझसे मुडके पूछा जाता है, तुमपे विश्वास कर सकते हैं?

क्या इतने दिनोंकी सच्चाई भूल गए सब? ये भूल गयेकी, जब उन लोगों की सुविधा होती तो ख़ुद भी झूठ कहते और मुझसेभी केहेलवाते..?

यही हुआ असर कि, बद अछा बदनाम बुरा...मैंने अपने बेटेके भले की सोची,कि वो शायद मेरे बहाने सेविंग शुरू कर दे...शायद, कभी कबर अपनी माँ के पास आ बैठे.....वो सब सपने रह गए...बडाही विकृत सत्य सामने आया...जो ताउम्र मेरा पीछा नही छोडेगा...मैंने लोगोंके कितनेही घिनौने असत्य, वोभी मेरे बारेमे भुला दिए हैं..और आगे बढ़ गयी...यही सोचके जिसने असत्य कहा, उसेभीतो पीडा पोहोंची ही होगी....
मुझे क्यों इस एक बातकी माफी नही मिल सकती? इसलिए कि, मैंने शातिर झूठी नही थी...के मुझसे ये उम्मीद नही थी...लेकिन अन्य कितनीही उम्मीदें मैंने चुपचाप पूरी की हैं..उनका कोई मोल नही?
चलिए, इन अदालतोंसे बरी होना मेरी किस्मत नही...

समाप्त।

अगली बार कुछ इस्सेसेभी अधिक विस्मयकारक बरतावोंके बारेमे लिखूँगी...नेकी कर कुएमे दाल...हर समय यही
बात गाँठ बांधके चलना चाहिए...

मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

क्यों होता है ऐसा...? २

एक और कहावत का मतलब मुझे किसी उम्रतक समझमे नही आता था...." चोरकी दाढी मे तिनका!" सोचती थी, चोरकी हमेशा दाढी होती होगी? जिसकी नही वो चोरी नही करता....तब तो चोरको पहचान लेना आसान....दाढ़ी वाले लोगोंसे बचके रहना चाहिए....कैसा बचपना था....! पर फिरभी एक बात नही समझ आती,कि, चोर अपनी दाढी मे तिनका क्यों लगाता होगा? ......उसे पहचान लेना और आसान....!

खैर! ये हुई बचपनकी बातें...मुहावरे हर भाषामे तकरीबन एक जैसे होते हैं...वजह: इंसानी ज़हनियत दुनियामे कहीँ जाओ, एक जैसीही होती है...!

मै झूट के बारेमे बता रही थी। उसी बातपरसे एक और बचपनका क़िस्सा बताती हूँ...इस क़िस्सेको बरसों बाद मैंने अपनी दादी को बताया तो वो एक ओर शर्मा, शर्मा के लाल हुई, दूसरी ओर हँसतीं गयीं....इतना कि आँखों से पानी बहने लगा...

मेरी उम्र कुछ रही होगी ४ सालकी। मेरा नैहर गांवमे था/है । बिजली तो होती नही। गर्मियों मे मुझे अपनी दादी या अपनी माँ के पलंग के नीचे लेटना बड़ा अच्छा लगता। मै पहले फर्शको गीले कपडेसे पोंछ लेती और फ़िर उसपे लेट जाती....साथ कभी चित्रोंकी किताब होती या स्लेट । स्लेट पे पेंसिलसे चित्र बनाती मिटाती रहती।

ऐसीही एक दोपहर याद है.....मै दादीके पलंग के नीचे दुबकी हुई थी....कुछ देर बाद माँ और दादी पलंग पे बैठ बतियाने लगी....उसमेसे कुछ अल्फाज़ मेरे कानपे पड़े...बातें हो रही थी किसी अनब्याही लड़कीके बारेमे....उसे शादीसे पहले बच्चा होनेवाला था...उन दोनों की बातों परसे मुझे ये एहसास तो हुआ,कि, ऐसा होना ठीक नही। खैर!

मेरी माँ, खेतपरकी कई औरतोंकी ज़चगी के लिए दौड़ पड़ती। हमारे घरसे ज़रा हटके दादा ने खेतपे काम करनेवालोंके लिए मकान बनवा रखे थे। वहाँसे कोई महिला माँ को बुलाने आती और माँ तुंरत पानी खौलातीं, एक चाकू, एक क़ैचीभी उबालके साथ रख लेती...साथमे २/४ साफ़ सुथरे कपडेके टुकड़े होते....फिर कुछ देरमे पता चलता..."उस औरत" को या तो लड़का हुआ या लडकी....

एक दिन मै अपने बिस्तरपे ऐसेही लोट मटोल कर रही थी...माँ मेरी अलमारीमे इस्त्री किए हुए कपड़े लगा रही थीं....
मुझे उस दोपेहेरवाली बात याद आ गयी..और मै पूछ बैठी," शादीके पहले बच्चा कैसे होता होता है?"
माँ की और देखा तो वो काफ़ी हैरान लगीं...मुझे लगा, शायद इन्हें नही पता होगा...ऐसा होना ठीक नही, ये तो उन दोनोकी बातों परसे मै जानही गयी थी...
मैंने सोचा, क्यों न माँ का काम आसन कर दिया जाय..मै बोली," कुछ बुरी बात करतें हैं तो ऐसा होता है?"
" हाँ, हाँ...ठीक कहा तुमने..."माँ ने झटसे कहा और उनका चेहरा कुछ आश्वस्त हुआ।
अब मेरे मनमे आया, ऐसी कौनसी बुरी बात होगी जो बच्चा पैदा हो जाता है.....?
फिर एकबार उनसे मुखातिब हो गयी," अम्मा...कौनसी बुरी बात?"

अब फ़िर एकबार वो कपड़े रखते,रखते रुक गयीं...मेरी तरफ़ बड़े गौरसे देखा....फ़िर एक बार मुझे लगा, शायद येभी इन्हें ना पता हो...मेरे लिए झूट बोलना सबसे अधिक बुरा कहलाया जाता था...
तो मैंने कहा," क्या झूट बोलते हैं तो ऐसा होता है"?
"हाँ...झूट बोलते हैं तो ऐसा होता है...अब ज़रा बकबक बंद करो..मुझे अपना काम करने दो.."माँ बोलीं...

वैसे मेरी समझमे नही आया कि , वो सिर्फ़ कपड़े रख रही थीं, कोई पढ़ाई तो कर नही रही थी...तो मेरी बातसे उनका कौनसा काम रुक रहा था? खैर, मै वहाँसे उठ कहीँ और मटरगश्ती करने चली गयी।

इस घटनाके कुछ ही दिनों बादकी बात है...रातमे अपने बिस्तरमे माँ मुझे सुला रहीं थीं....और मेरे पेटमे दर्द होने लगा...हाँ! एक और बात मैं सुना करती...... जब कोई महिला, बस्तीपरसे किसीके ज़जगीकी खबर लाती...वो हमेशा कहती,"...फलाँ, फलाँ के पेटमे दर्द होने लगा है..."
और उसके बाद माँ कुछ दौड़भाग करतीं...और बच्चा दुनियामे हाज़िर !

अब जब मेरा पेट दुखने लगा तो मै परेशाँ हो उठी...मैंने बोला हुआ एक झूट मुझे याद आया...एक दिन पहले मैंने और खेतपरकी एक लड़कीने इमली खाई थी। माँ जब खाना खानेको कहने लगीं, तो दांत खट्टे होनेके कारण मै चबा नही पा रही थी...
माँ ने पूछा," क्यों ,इमली खाई थी ना?"
मैंने पता नही क्यों झूट बोल दिया," नही...नही खाई थी..."
"सच कह रही है? नही खाई? तो फ़िर चबानेमे मुश्किल क्यों हो रही है?" माँ का एक और सवाल...
"भूक नही है...मुझे खाना नही खाना...", मैंने कहना शुरू किया....

इतनेमे दादा वहाँ पोहोंचे...उन्हें लगा शायद माँ ज़बरदस्ती कर रही हैं..उन्होंने टोक दिया," ज़बरदस्ती मत करो...भूक ना हो तो मत खिलाओ..वरना उसका पेट गड़बड़ हो जायेगा"....मै बच गयी।
वैसे मेरे दादा बेहद शिस्त प्रीय व्यक्ती थे। खाना पसंद नही इसलिए नही खाना, ये बात कभी नही चलती..जो बना है वोही खाना होता...लेकिन गर भूक नही है,तो ज़बरदस्ती नही...येभी नियम था...

अब वो सारी बातें मेरे सामने घूम गयीं...मैंने झूट बोला था...और अब मेरा पेटभी दुःख रहा था...मुझे अब बच्चा होगा...मेरी पोल खुल जायेगी...मैंने इमली खाके झूट बोला, ये सारी दुनियाको पता चलेगा....अब मै क्या करुँ?
कुछ देर मुझे थपक, अम्मा, वहाँसे उठ गयीं...

मै धीरेसे उठी और पाखानेमे जाके बैठ गयी...बच्चा हुआ तो मै इसे पानीसे बहा दूँगी...किसको पता नही चलेगा...
लेकिन दर्द ज्यूँ के त्यूँ....एक ४ सालका बच्चा कितनी देर बैठ सकता है....मै फ़िर अपने बिस्तरमे आके लेट गयी....
कुछ देर बाद फ़िर वही किया...पाखानेमे जाके बैठ गयी...बच्चे का नामोनिशान नहीं...

अबके जब बिस्तरमे लेटी तो अपने ऊपर रज़ाई ओढ़ ली...सोचा, गर बच्चा हो गया नीन्दमे, तो रज़ाई के भीतर किसीको दिखेगा नही...मै चुपचाप इसका फैसला कर दूँगी...लेकिन उस रात जितनी मैंने ईश्वरसे दुआएँ माँगी, शायद ज़िन्दगीमे कभी नही..
"बस इतनी बार मुझे माफ़ कर दे...फिर कभी झूट नही बोलूँगी....मै इस बच्चे का क्या करूँगी? सब लोग मुझपे कितना हँसेंगे? ".....जब, जब आँख खुलती, मै ऊपरवालेके आगे गुहार लगाती और रज़ाई टटोल लेती...

खैर, सुबह मैंने फ़िर एकबार रज़ायीमे हाथ डाला और टटोला...... कुछ नही था..पेट दर्द भी नही था...ऊपरवालेने मेरी सुन ली...
उसके बाद मैंने शायदही कभी झूट बोला...एकबार शायद...वोभी झूट नही था...शायद टालमटोल थी..लेकिन, उस कारण मेरे भाईको पिटते देखा, माँ के हाथों, तो मेरी निगाहें उठ नही पायीं और मैंने मान लिया कि, मैंने ठीकसे नही देखा...जोभी था...जल्दबाज़ी की..वो किस्सा कहूँगी तो बोहोत अधिक विषयांतर हो जाएगा.....

इतना सारा लिख गयी, उसकाभी कारण है...जब मुझे झूट कहनेके लिए ज़बरदस्ती की जाने लगी, तो मेरे मनमस्तिष्क पे उसका गहरा असर होने लगा...शायद मुझे उसवक्त नही समझमे आयी ये बात...बड़ी तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी थी...लेकिन, एक बोझ, एक डर का साया, मेरे अतराफ़ मँडराने लगा....
अपने नैहर आती,तो मुझे उनसे ये बात कहते हुए बेहद शर्म आती कि, मुझे अपने ससुरालमे झूट बोलना पड़ता है....
और येभी डर रहता कि , मुझे कई चीज़ों के बारेमे हिदायत देके भेजा गया है..." तुम ये ना कहना, तुम ऐसे ना बताना...कहीँ जाके तुम ऐसा कह दो"...हज़ारों बंदिशें...

असर ये कि, मै बेहद खामोश हो जाती...अपने आपको अपने कमरेमे बंद रखती...गुमसुम-सी...मेरे दादा भाँप लेते कि, कहीँ तो कुछ है...मुझसे पूछ बैठते,"क्यों बच्ची ,तू इतनी खामोश, अकेली-सी रहती है? कितनी घूमा फिरा करती थी....सायकल चलाया करती थी...किताबों मेसे पढ़के सुनाया करती....गाने बजते रहते...बल्कि, मै रेडियो बंद कर देता....फूल सजाती...बगीचेमे काम करती...शादी क्या हो गयी, तू तो एकदमसे तब्दील हो गयी...!"

उनके चेहरेपे साफ़ परेशानी झलकती... मै औरभी खिज जाती...ये सोच कि, मेरा अपनी उदासी छुपनेका प्रयास असफल हो रहा है....
उनपे बरस पड़ती," दादा, आप क्यों मेरे पीछे पड़ जाते हो? मुझे नीन्द्की कमी है, बस.... मै इसलिए सोती रहती हूँ...और वहाँ मुझे किताबे पढ़नेका मौक़ा नही मिलता, तो यहाँ पढ़ती हूँ..."

बेचारे, छोटा-सा मुँह ले हट जाते...आज जब वो चेहरा निगाहों के सामने आता है तो मेरी आँखों से सावन की झडी बहने लगती है....सबकुछ धुन्दला जाता है...

क्या से क्या हो गया....देखभी रही थी कि, क्या कर रही हूँ..अपनेआपको झूटका छोटी छोटी मात्रायों मे ज़हर दिए जा रही हूँ...जैसे कोलेरा आदीसे लड़नेके लिए उसीके जीवाणु कम मात्रामे दिए जाते हैं...
मेरे मस्तिश्क्मे ये ज़हर पैवस्त हो रहा था...कभी तो इसका दुष्परिणाम होगा...कहीँ तो होगा...क्योंकि इस बातको ना मेरा मन स्वीकार रहा था ना दिमाग़.....

मेरी सहेत पे इसका असर होने लगा था...जो मुझे तब नही नज़र आया....हज़ार दूसरे कारण मेरे आगे आते रहे, लेकिन आज जब मुड़ के देख रही हूँ, तो सबसे बड़ा कारण यही था....जीवन मूल्य इतने अधिक तेज़ीसे बदले जा रहे...और मै उनके साथ समझौता नही कर पा रही थी....

कभी मनमे आता, झूट बोलनेसे तो बेहतर है, कुछ बातें कहीही ना जाएँ....लेकिन उसके अपने परिणाम हुए....और ज़्यादा शक के घेरेमे मै आ जाती....ये दुविधा मेरे लिए एक मर्ज़ बनती चली गयी...

आज फिर एकबार अपनाही विश्लेषण करने निकल पड़ी हूँ...एक अकेले सफर पे...
जब शुरू किया लिखना तब शायद, इस विषय पे इतनी गंभीरतासे लिखनेका इरादा नही था...लेकिन विषयही मैंने गंभीर चुन लिया....!
अब देखना है मेरे पाठक चहेते, जो "दुविधा" से बँधे थे, वो इस मालिका से बँधते हैं या नही....इतनी लम्बी तो ये खिंचेगी नही...४६/४७ कड़ियाँ नही होंगी...यही कोई ५/७......
लिखनेका मकसद सिर्फ़ एक है....अपने आपका हेतुपुरसपर निरिक्षण और पाठकों से एक सच्चा संवाद...निष्कर्ष चाहे जो निकले...
क्रमशः

सोमवार, 27 अप्रैल 2009

क्यों होता है ऐसा.?..१

हम क्यों कहते हैं," बद अच्छा बदनाम बुरा?" पहले नही समझ आती थी मुझे...बरसों नही समझी कि , इस कहावत का क्या मतलब होगा...सुनती रही बडोंके मुहसे...लेकिन इसका मतलब जान लेनेकी पता नही क्यों, कभी कोशिश नही की...और फिर खुदही जान गयी...जब एकबार मुझपे गुज़री...
वही कुछ वाक़यात बताने जा रही हूँ...

बचपनमे हमें सिखाया गया था, हर हालमे सत्य ही कहना...तो हम बच्चे हर हालमे सत्य ही बोलनेपे अमादा रहे...हाँ...ज़िंदगी जीते, जीते इतना सीखे कि , किसीकी आबरू या जान बचानी हो तो उस समय ज़रूरी नही कि, जो व्यक्ती वही करनेपे तुला हो, उसीके सामने किसीका "सत्य" उजागर किया जाय...
पहले मजबूरी तो जान ली जाय, अपनेआपको खुदा से बढ़के ना समझें...न्याय-अन्याय, सत्य-असत्यका फैसला उस विराट शक्तीपे छोड़ दें...जिसने असत्य कहा होगा, उसकी हालत तो देखें..कि उसपे क्या गुज़र रही होगी...गर वो किसी बोझ तले दबा है,तो पहले उसे तो प्यारसे हल्का करें..उसे तो आश्वस्त करें....ज़रूरी नही कि उसेही कट्घरेमे लेके और दर्द पोहोंचाया जाय...खुदका " सत्य वचनी सत्यवान" होनेका दावाही एहेम समझा जाय...

कोई बच्चा झूट बोलनेकी शिक्षा लेके जन्म तो नही लेता...इन्सानपे दो चीजोंका असर होता है..और ये मनोविज्ञानिकों का माना हुआ " सच" है...वो ये: १)अनुवंश( heredity) २) परिसर (environment).
बड़ा होते, होते बच्चा जाने अनजानेमे गौर करता है, कि किस चीज़मे अधिक फायदा है...वो एक स्पंजकी तरह अपने अतराफ़ मे होती बातें,अपने अन्दर सोखता रहता है.. उसकी माँ, बाप तथा अन्य व्यक्ती, कब क्या कहते हैं, करते हैं...इसीलिये तो कहते हैं, कि, बच्चों के सामने ज़बान सम्भालके बात करनी चाहिए....खैर...

जब ज़िन्दगीमे क़दम रखा तो देखा, सच बोलनेपे बड़ी डांट भी सुननी पड़ती है...अपनी खैर मानानी हो, तो बेहतर लगता है , थोड़ा-सा झूट बोल देना..जैसे किसीने पूछा ," दवाई लेली?"
अब मनमे ये जानती होती कि, मेरी सेहेतकी तो ,पूछनेवाले को परवाह नही, लेकिन सबके आगे दिखावा है...और मै येभी जानती थी, कि मै भूली नही, लेकिन एक पलकीभी मोहलत नही मिली कि खा लूँ...गर कहूँ,कि, मोहलत नही मिली, तो बेहद आफत...सुनना पडेगा," ऐसाभी क्या काम था...क्या सारा समय कामही करती रहती हो?"
गर कहती ," हाँ! आपहीने तो मुझे कहा था, कि पहले ये सब ख़त्म करना...फिर और कुछ...इस समय तक ये सब होनाही चाहिए..कोई बहाना नही.."तो औरभी बड़ी आफत...!
बेहतर के कह दूँ ," भूल गयी...अभी लेती हूँ..",क्योंकि, ऐसा कहके वाकई,सब काम रोकके, मै दवाई ले सकती थी..!

फोन आ जाय और कह दूँ," हाँ हैं, देती हूँ...",तो सुनूँ," किसने कहा था, घरपे हैं कहनेको? कह नही सकती थी, के नही हैं?"
अगली बार फोन बजा तो उठानेसे पहले पूछा,इशारेसे, कि, क्या जवाब देना चाहिए...इशारा हुआ, बाहर गए हुए हैं, कह दो।
मैंने फोनपे,कौन बोल रहा है ये जान लेने के बाद कह दिया," वो तो बाहर गए हैं....... ...."
वहाँसे पूछा गया," अरे...! कहाँ गया है? उसने तो मुझे अभी १० मिनिट मे मिलने बुलाया था...कबतक लौटेगा?"
अब मै बौखला गयी...मुडके देखा,तो, जिनसे पूछना चाहिए..वो नज़रके परे...मैंने कह दिया," जी..वो तो पता नही..."
"लेकिन गया कहाँ है? " उधर पूछा गया...
" शायद...शायद...अस्पताल....", कहते हुए मै पसीना, पसीना हो रही थी...क्योंकि बात करनेवाला व्यक्ती हमारा बेहद करीबी था...!
" अस्पताल? क्यों? क्या हुआ? सुबह तो कुछ कहा नही...! कौनसे अस्पताल?" उधरसे पूछा गया...
"नही, वैसे कुछ ख़ास नही..मतलब ज़रा गला ख़राब था..और...थोड़ा बुखारभी...तो.."अबतक मै तकरीबन हकलाने लगी थी...
" चलो ठीक है...जब लौटे तो कह देना मेरा फोन था...अबतो मै लेट हो जाऊँगा....मुझेभी आगे जाना है..वो तो उसने कहा था, 'मुझे साथ ले चलना' ....ऐसा कैसा किया उसने...एक फोन तो कर देता...मैंने अपनी दूसरी appointment मुलतवी कर दी थी..." उस व्यक्तीने मुझसे कहा और फोन नीचे रख दिया...

मैंने ,अन्दर आके फोनपे हुई बातचीतके बारेमे बताया.....और वो व्यक्ती मुझपे आग बरसाने लगा," तुम्हें किसने कहा था कि इस व्यक्तीको ऐसा कहना? तुम्हें अपनी अक़ल नही थी? उसके साथ जाना था, इसलिए तो मैंने सोचा कोई ऐरा गैरा होगा, उसे मै घरपे नही हूँ, ये कह दिया जाय..हद है तुम्हारे बेवक़ूफ़ीकी...जाओ..अभी फोन करो उसे और कहो,कि, मै आ गया हूँ.."
अब मुझे पहलेही ये बात बता दी गयी होती, कि फलाँ, फलाँ आदमी आनेवाला है..जिसके साथ इन्होने जाना है, तो मै आगाह तो हो गयी होती...मै अंतर्ज्ञानी तो नही थी/या हूँ!

मैंने उस व्यक्तीका फोन घुमाया....वहाँसे आवाज़ आयी," वो तो निकल चुका है.."
ये इत्तेला देनेवाले जनाब उस व्यक्तीके पिता थे...उनके आगे मै और तो कुछ कह नही सकती थी...मैंने फोन रख दिया...

जब, इस बारेमे मैंने इत्तेला दी तो मुझे सुनाया गया," ये सब तुम्हारी बेवाकूफीके कारन हुआ...पता नही, उसके बाऊजी सच कहते थे कि झूट...बड़े घाग हैं...मेरा सारा काम तुमने चौपट कर दिया..."

ऐसे वाकयातके बाद मै फोन उठानेसे डरने लगी...गर, घंटी बजने देती तो आफत...उठा लेती तो ,निगाहेँ मुझपे गडी पाती, कि क्या जवाब दे रही हूँ...
एकबार मैंने कहा," रुकिए, मै देखके बताती हूँ...."
उधरसे जवाब आया," क्या ये बात उसने तुम्हें कहनेके लिए कही है? दो कमरोंका घर है...फोन रखा है वहाँसे तो पूरे घरपे नज़र जाती है, और आप कह रही हैं,'देखके बताती हूँ...'...नही फुरसत उसे तो सीधा कह दे..अव्वल तो काम उसीका था..और बीबीसे कहलवा रहा है," देखके बताती हूँ' ऐसा कह दे...कह दो उसे कि, अब मै दो दिन बाहर हूँ...दो दिनके बाद जब तुम्हें वो 'दिख'जाय तो बता देना...मेरा फोन था", और उधरसे फोन पटक दिया गया...

जैसेही मै पीछे मुडी, जिसके लिए फोन था, वो रु-ब रु !!!
"किसका फोन था",मुझसे पूछा गया...
मैंने डरते,डरते बता दिया...
तो सुनने मिला," हद है...ठीक ही कह रहे थे वो..दो कमरोंका तो घर है...कैसे इतनी बेवकूफ हो?
अब यही बात पहले कई बार मुझसे कही गयी थी,कि, जब किसीको सच ना बताना हो तो, ऐसा कह दिया जाय...!

खैर, आगेभी ज़िन्दगीमे मुझे ये एहतियात हमेशा मिलती रही," अब मै ऐसे कहनेवाला/वाली हूँ...! तुम अपनी मत चला देना...कहीँ कह दो,'अरे कौन-सी शादीमे जाना है यहाँसे...मुझे तो नही बताया..?"

ऐसाभी मौक़ा आया जब ,कहीँ शादीमे जाना है,ये बात मैंने एक समारोहमे कह दी...
अगलेने पूछ लिया," अच्छा? किसकी? किस इलाकेमे है? थोड़ा-सा तो खाके जाओ..."
" वो..इलाक़ा तो ...नही पता...मै.."....उफ़! मुझेही क्यों पूछ लेते हैं सब...?
मै वहाँसे हट गयी...मेरे कानपे अल्फाज़ पड़े," ये लोग अपनी औक़ात भूल जाते हैं...आगे शादीमे जाना है...जानता हूँ...इस लड़कीकी नाक चढी रहती होगी.."

येभी सीख गयी कि, जब "सीधी उँगली से घी ना निकले तो तेढीसे निकालना पड़ता है.."...इस कहावत का मतलब भी मै बरसों नही जान पायी थी...

और एकबार, केवल एकबार कुछ ४/५ वर्ष पहले, हताशामे आके मैंने बिना सोचे समझे झूट बोल दिया तो...उफ़ !
उस एक झूटने मेरा पीछा कभी नही छोडा...शायद ता-उम्र नही छोडेगा....मेरा हर सत्य, उस "झूट" के निकशपे तलाशा जाता है...मैंने अपने बच्चों को कभी सच बोलनेसे रोका नही...लेकिन...बल्कि हमेशा सराहा....इसलिए, यही बात मेरे आड़े आ गयी...

अगली बार बताउंगी वो क्या था...क्या चाहा था, और हो क्या गया था...कारन यही था, कि, मै मंझी हुई "झूटी" नही थी...
ज़िंदगी मे इस एक बात के कारन कितनी अधिक तबाही मची....तबतक मै बदनाम नही थी..नाही बद....जबकि, ऐसा साबित करनेकी हर मुमकिन कोशिश की गयी थी....

क्रमशः

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

ये कहाँ आ गए हम...?७

उस शाम पे आके अटकी हूँ...उसवक्त, जब मेरे कनोंपे वो ख़बर टकराई...मुझे समझ नही आ रहा था कि मै क्या प्रतिक्रिया करूँ...मेरी क्या प्रतिक्रया होनी चाहिए...??
सबसे पहले तो मैंने वंदन और निम्मीकेही नंबर घुमाए...क्या कमाल था कि दोनों " पोहोंचके बाहर" थे...!! ऐसाभी क्या इत्तेफाक़??उठाके कहाँ दे मारूँ इन उपकरणों को ...? ये नज़दीकियों के साधन, जब दूरियाँ पैदा कर दें, तो इनका क्या फायदा? किसे कहूँ, कि रुको...अभी इन साधनों द्वारा दी जा रही जानकारीपे विश्वास ना करो? जिनसे कहना चाह रही थी...जिनसे सत्य जानना चाह रही थी...उन्हींसे संपर्क नही हो रहा था...

मैंने निम्मीके सास -ससुरसे पहले संपर्क करना चाहिए??क्या उनके कानों तक तो ये ख़बर नही पोहोंच गयी? गर पोहोंच गयी हो तो मै क्या कहूँगी...? मेरे पास कहनेको क्या रहेगा....?
जब मुझेही उस खबरकी यथार्थता मालूम नही, तो मै क्या कह सकती हूँ? ये, कि आप अभी उस खबरपे विश्वास न रखें...?
और गर नही मिली वो ख़बर तो मेरी परेशानी, मेरी अधीरता वो भाँप नही जाएँगे? और गर निम्मी या वंदन, दोनोसे उनका संपर्क नही, तो क्या मुझसे नही पूछ बैठेंगे...कि मैं कुछ जानती हूँ, उन दोनोंके बारेमे ?
सहजही पूछा जानेवाला प्रश्न होगा वो...तब मै क्या कहूँगी? के कुछ नही जानती? जब बादमे पता चलेगा कि, मै जानती थी...तो फिर क्या जवाब दूँगी? सिर्फ़ ये कि, उस खबरकी सच्चाई नही जानती थी?

मैंने मेरे पतीसे सबसे पहले संपर्क करना चाहिए...कैसी अजीब बात है...मै जब, जब बेहद शशोपंज मे रही हूँ, हर वक्त अकेली रही हूँ...इसमे कभी कोई मेरे साथ नही होता...क्या ये मेहेज़ एक इत्तेफाक होता है या ईश्वर हरबार मेरी परिक्षा लेना चाहता है?

मैंने इन्हें फोन लगाना शुरू कर दिया...." आप जिस व्यक्तीसे संपर्क करना चाह रहे हैं, वो इस वक्त पहुँचके बाहर है.."...उफ़ ! बार, बार यही एक वाक्य मेरे कानोंसे टकराता रहा...निम्मी और वंदन से तो संपर्क पहलेही नही था...

क्या ख़बर थी वो? ख़बर थी...किसी वंदन के सहयोगी द्वारा किया गया वो फोन था...." वंदन की प्रथम पत्नी गर्भवती है...वंदन केही बच्चे की माँ बनने वाली है...!!"
ऐसे कैसे हो सकता है? ऐसी बात वंदन करही नही सकता...लेकिन वो फोन क्यों नही उठा रहा है? वो तो अगली सुबह निम्मीके पास पोहोंचने वाला था....तो निम्मीसे संपर्क क्यों नही कर रहा??
और निम्मी ....? वो मेराभी फोन क्यों नही उठा रही ?? मेरा फोन बजबजके बंद हो रहा था...कितनी बार कोशिश कर चुकी थी....क्या उसे मेरे पहले ये भयंकर ख़बर मिल गयी?
और येभी कि, वंदन अब उसके पास नही लौट सकता? उसने येभी मान लिया कि, निम्मी या निम्मीके परिवारवाले उसे माफ़ नही करेंगे? के गर उसे अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी निभानी होगी तो उसे, उसकी प्रथम पत्नीके पासही लौटना होगा...? तो क्या निम्मीके प्रती उसकी कोई ज़िम्मेदारी नही? उसकी प्रथम पत्नी कैसे उसपे ये ज़िम्मेदारी डाल सकती है, जब वो कोई छोटी बच्ची नही...? अपने पतीसे कानूनन बिभक्त हो चुकी है...निम्मी वंदन की क़ानूनन ब्याहता है....

जोभी हो, वंदन की ज़िम्मेदारी है, कि आमने सामने बात साफ़ करे....जिस विश्वासके साथ निम्मीने उसे उसकी भूतपूर्व पत्नीके पास भेजा था....उतनीही जिम्मेदारीसे उसने अपना बर्ताव रखना चाहिए था...

सुबह हो गयी....लेकिन मै किसीसेभी संपर्क नही कर पायी....लग रहा था, जैसे मै किसीभी वक्त अपने होश खो बैठ सकती हूँ....और एक दिन बाद मेरे बच्चे, जो दोनों शेहेरके बाहर थे, लौट आएँगे...मै उनसे अपनी हालत तो नही छुपा सकती...वंदन की कितनी इज्ज़त करते हैं दोनों...उन्हें क्या कहूँगी??

एकेक पल, मानो एक सदीकी तरह गुज़र रहा था....पर वक्त थम नही रहा था...उसी रफ्तारसे गुज़र रहा था....मुझे चाहे एक पल,एक युग लगे....शांत, स्तब्ध मौहौलमे, मेरे कमरेकी घडीकी टिकटिक सुनायी दे रही थी....मेरे हाथसे फिसल रहे लमहोंका कितना अधिक एहसास करा रही थी....

मेरे घरमे कितनी विलक्षण खामोशी थी....कान कितने अधीर थे कि, कहीँ कोई इंसानी वजूदका एहसास हो...कुछ तो आवाज़ हो...एक बार तो फोन बजे...चाहे कहींसे हो....अपने मोबाइल से मै चिपकी हुई थी....चाय बनाऊँ ? कॉफी बनाऊँ? पियूँ ? बेहतर लगेगा? नही...बनानेकी ताक़त नही है...कामवाली औरत को छुट्टी दे रखी थी....

पडोसमे जाऊँ? क्या कहूँ वहाँ जाके? जिनके आगे मैंने वंदन को एक फ़रिश्ता बनाके पेश किया था....उन्हें ये कहूँ कि वो फ़रिश्ता क्या...एक घटिया से घटिया आदमीकी तौरपे सामने आ रहा है....बेज़िम्मेदार, डरपोक...

लेकिन मुझे अभी सच पता था? सचमे ऐसा हुआ था? बेहतर होगा, मै खामोश रहूँ....लेकिन ये इंतज़ार मेरी जान ले रहा था...असह्य लग रहा था........टिक टिक....खामोशी को भेदनेवाली यही एक आवाज़.....

मै लेट गयी...पैर...पैर क्या, अब तो पूरा जिस्म काँप रहा था...
और फोन बजा...मै ऐसे झपटी, जैसे चीता किसी शिकारकी तरफ़ झपटता हो....फोन मेरे पतीका था...
" क्या कर रही हो? तुम्हारी आवाजमे इतनी परेशानी क्यों है?",इनकी आवाज़...
" परेशाँ हूँ...बेहद...आपसे कितनी बार संपर्क करनेकी कोशिश कर चुकी...क्या आपको मेरे sms भी नही मिले?",मै बरस पड़ी ...
" नही तो..मुझे तो हैरानी हो रही थी कि, मै फोन करता जा रहा था, और मुझे मेसेज मिल रहा था," पोहोंचके बाहर...", इनका उत्तर...
"कमाल है...मुझे आपकी ओरसे यही मेसेज मिल रहा था...खैर !आप अभी के अभी, पहले वंदन और फिर निम्मीसे संपर्क करनेकी कोशिश कीजिये....उनसे..."मै इन्हें निर्देश देने लगी....
"लेकिन बात क्या है? मुझे पहले ये तो बताओ...क्या परेशानी है? ऐसी क्या जल्दबाज़ी है...? हो क्या गया है तुम्हें?", इन्होंने टोक दिया....
मैंने संक्षेपमे इन्हें सारी बात बता दी....ये कुछ समय स्तब्ध हो गए....फिर बोले,
"मेरी निम्मीसे बात हुई.....निम्मीको ये ख़बर दी गयी है....वो पूरी तरह टूट गयी है....मै जानना चाह रहा था तुमसे...कि तुम्हें कुछ आगेकी बात पता है....निम्मीने मुझसे कहा,' मै तो वंदन को माफ़ कर दूँ...पर मुझसे बात तो करे....मै समझ सकती हूँ...इंसान है...उसने उस औरतसे कभी प्यार किया था...लेकिन मुझसे बात तो करे....'..."
इन्हों ने मुझे ख़बर दी।

"तो निम्मीने आपसे बात की..मुझसे नही...? कमाल है...? उसने एक पलभी नही सोचा कि, जब मुझे ख़बर मिली होगी तो मुझपे क्या गुजरेगी..?"अब मुझे निम्मीपे गुस्सा आने लगा....
" देखो, जो मेरे साथ हुआ...वही उसके साथ...उसेभी तुम्हारा नंबर नही मिल रहा था...और ना मुझे पता था, ना उसे, कि तुम्हें किसीने ख़बर दी होगी...", मेरे पतीने मुझसे बताया...
"तो अब हमें क्या करना चाहिए? कैसे पता चलेगा कि, सच्चाई क्या है? कौन बतायेगा? आप वंदन का फोन तो मिलाएँ...", मै बताने लगी....
"तुम्हें क्या लगता है..मैंने वंदन को फोन नही लगाया होगा...? "इन्होंने पूछा....
"चलिए ठीक है...जब मुझे येही नही पता था कि, आपसे निम्मीका संपर्क हुआ, तो मै और क्या कह सकती थी...?"मैंने जवाब दिया....

निम्मीकी प्रतिक्रया सुन, मुझे कुछ तो तसल्ली मिली...गर वंदन सीधे संपर्क करे,तो बात बन सकती है....एक सदमाही सही...हम सभीके लिए...लेकिन, जीवन आगे तो बढ़ सकता है....
उस राततक मेरे पती और बच्चे लौट आए....बच्चे अपनेआपमे इतने मशगूल थे, कि घरमे क्या हालत हैं, उन्हें महसूस ही नही हुआ...थके हुए थे...जल्दी सोभी गए...एक और रात गुज़र गयी....

अंतमे वो लम्हा भी आ गया जब वंदन हमसे रु-बी-रु हुआ....मै बता नही सकती कि, वो दिन मेरे लिए क्या लेके आया....

सारी बातें साफ़ होने लगीं...जो हमें बताया गया था, वो पूर्ण असत्य था...वंदन की पत्नी बीमार थी...वंदन उसे अस्पताल ले गया था...
और जिस व्यक्तीने वो ख़बर दी...वो? उसने क्यों ये सब कहा....वंदन ने उसे नोटिस दे दी थी....जिस अस्पतालसे वंदन जुडा हुआ था, उस अस्पतालमे उस व्यक्तीने कुछ बोहोतही अनैतिक हरकत की थी.....बस उसी बातका उसने बदला लेना चाहा..और हमारे अत्याधुनिक संपर्को के ज़रियों ने, उसने सोचाभी नही था, उतना उसका काम आसान कर दिया...

मेरा ईश्वरके ऊपर, उस विराट शक्तीके ऊपर, तो विश्वास औरभी बढ़ गया...लेकिन, इन संपर्को के ज़रियोंपर कितना विश्वास हमने करना चाहिए....ये सवाल खड़ा कर दिया...आगाह कर दिया उन ४८ घंटोंने....हमें जबतक हमारा अपना, अपने मुहसे कुछ नही कहता....वोभी आमने, सामने...किसी औरपे विश्वास नही रखना चाहिए...हमारी ज़िंदगी तबाह हो सकती है...

दुआ करती हूँ, ऐसा भयानक दौर किसीके ज़िन्दगीमे ना आए.....आज वंदन और निम्मी हमें उतनेही प्यारे हैं...जितनेकी कभी थे....अच्छा हुआ..मुझे ईश्वरने सही बुद्धी दी, कि, मैंने निम्मीके सास-ससुरसे संपर्क नही किया...वरना, उन्हें, उनके बुढापे मे ना जाने कितना अधिक सदमा मिल जाता....अच्छा हुआ कि, उस व्यक्ती के पास उनका नंबर नही था....वरना उसने उन्हें जीते जी मार दिया होता....
समाप्त।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

ये कहाँ आ गए हम...? ६

निम्मी तथा उसका परिवार जब हमारे शेहेरसे विदा हुए तो लगा, जैसे कोई अपने नैहरसे विदा ले रहा है.....निम्मी इसतरह मेरे गले लगके रोई कि, हर आँख रो दी....अजीब आलम था...माँ-बाबूजी उसके लिए खुश थे...अपने आपके लिए कहीँ एक और बिछोह्का गम मनमे छुपाये हुए...

वंदन भी गया.....शायद उसके लिए इतनी दुविधा नही थी...

ब्याह्की तारीखभी तय हो गयी...एक माहके अन्दर, अन्दर सब होना था...और जितना मैंने सोचाभी नही था, उससे कहीँ अधिक आसानीसे सबकुछ हो गया...ब्याह मेरे घरसे हुआ...विदा किया, निम्मीके सास ससुरने ...जो हमेशा उसके माता पिता रहे....उसकी बेटियाँ, मानो उसकी सखियाँ बन गईं थीं........

उन्हें उनकी पाठशालाकी पढाई होनेतक अपने दादा दादीके पासही रखना तय हुआ था...और निम्मीभी कुछ रोज़ वंदन के साथ बिता, उन्हींके पास चली आयी....

वंदन ने अपनी वैद्यकीय practice के लिए , निम्मीके ससुरालके पासका एक महानगर चुन लिया...केवल दो घंटों का फासला था....
हरेक चीज़ जैसे पूर्व निर्धारित हो, अपनेआप घटती गयी....मुझे कई बार लगता मानो एक सपना देख रही हूँ...
कितनी बार उस विराट शक्तीके आगे नतमस्तक हो जाती....इसकी गिनतीही नही रही...

३ साल पँख लगाके बीत गए.....मेरे बच्चे, दोनों अलग, अलग शेहेर, आगेकी पढ़ाई के खातिर जानेका विचार करने लगे...मै दिल थामे बैठे रही....

वंदन का दुनियाके विभिन्न शहरों मे सेमीनार/ कांफ्रेंस के लिए आता जाता रहता....निम्मीसे फोनपे बात हो जाया करती.....वंदन भी फोन कर दिया करता...निम्मीने एक नामांकित पत्रिकामे काम करना शुरू कर दिया था...एक मौक़ा ऐसा आया, जब उसे अन्य देशमे मेहमान faculty के तौरपे आमंत्रण आया....उसके माँ-बाबूजी ने अपनी पोतियों की ज़िम्मेदारी सहर्ष स्वीकार कर ली....निम्मी और वंदन, दोनोही दो अलग देशों मे चले गए...

और पता नही कैसे, क्या हुआ, उनका, आपसी तथा, अपने परिवारके साथ संपर्क हो नही पाया....

विवाह्के बाद एकबार वंदन की प्रथम पत्नी ने वंदन के साथ संपर्क बनानेकी कोशिश की थी...निम्मीनेही वंदन को प्रोत्साहित किया कि, वो अपने मनमे कटुता न रखे...और एक दोस्तकी तरह उससे मिल लिया करे...वंदन का UK सबसे अधिक आना जाना रहता....

अबके जब दोनों बाहर मुल्क गए हुए थे, वंदन का आखरी फोन उसकी प्रथम पत्नीके शेहेरसे आया...निम्मीसे बात हुई...और उस वार्तालाप के बाद, वंदन का फोन निम्मीने लगातार बंद पाया...इतनी ख़बर तो मुझे मिली...और फिर उस शाम वो अजीबो गरीब ख़बर.....जिसने मेरे पैरों तलेसे ज़मीन खिसका दी....

क्या, करूँ ? हे इश्वर ! मुझे कोई तो राह दिखा...मै क्या करुँ? मै क्या करुँ ??ये ख़बर एक सपना था या, गुज़रे ३ साल... ......क्या सच था....क्या...क्या.....मेरा मन एक आक्रोश करता जा रहा था....किसे विश्वास दिलाऊँ...? किसकी जवाबदेही करुँ?? ना निम्मीसे संपर्क ना वंदन से.........बस एक वो ख़बर...उसके बाद जिसने वो ख़बर दी, उसके साथभी कोई संपर्क नही....
क्रमशः

रविवार, 12 अप्रैल 2009

ये कहाँ आ गए हम...? ५

मेरी एक पलभी आँख नही लगी...लेकिन कोई थकान नही थी....एक बच्चों की-सी ताज़गी और नए दिनका इंतज़ार...
कई बार मनमे आया निम्मीको गुदगुदाके जगा दूँ...फिर लगा, नही....मेरा मन एक सपना बुन रहा है...उसे जगाके गर ये सपना टूट गया तो??मैंने तो वंदन के दिलो दिमागमेभी एक ख्वाबका बीज बो दिया है...उसके कोंपल बननेसे पहले मुझे उखाड़ फेंकना पडा तो.....?
तो वंदन शायद ज़िंदगीभर निम्मीके आगे नही आयेगा...शायद मेरे आगेभी नही...एक दर्द , जो वो भूलना चाहेगा, मेरेसे मिलना उसे उसीकी याद दिला देगा....
पर मैंने ऐसे नकाराक्त्मक ख़याल दिलमे नही लाने चाहियें....मै नही तो शायद उसके माँ-बाबूजी( मतलब उसके सास-ससुर ), या उसकी अपनी बेटियाँ उसे मना सकती हैं....उसे सोचनेपे मजबूर कर सकती हैं...माँ-बाबूजीको, उनके बुढापेमे एक बेटा मिल जाएगा....वंदन के रूपमे...क्या इतनाभर काफ़ी नही...? उसे तुंरत निर्णय लेनेके लिए तो कोई नही कहेगा...सोच तो सकती है...

अपने पास लेटी ,अपनी सखीपे एक निगाह डाली मैंने....उसका पहला प्यार तो भुलानेके लिए कोई नही कह रहा...उसकी जगह तो कोई नही माँग रहा...बल्कि, उसकी उस भावनाकी हर किसीको कद्र है...
मूँदी हुई आँखें....आँखों के नीचे हल्की-सी कालिमा...मैंने निम्मीको गौरसे निहारा....इतनी मासूम मुझे वो कभी नही लगी थी...और शायद इतनी मायूसभी...समय हर घाव मिटाता है...पर देता क्यों है...? इसने क्या बिगाडा था? या माँ-बाबूजीने...? या उसकी औलादने??
इनमेसे किसी सवालका ना मेरे पास उत्तर था ना दुनियाके किसी ज्ञानी ध्यानीके पास...अपना नसीब....और क्या कहेँ?

निम्मीने एक करवट लेनी चाही शायद और उसका हाथ मेरे हाथपे आ पडा...एक झटकेसे जाग गयी...ऐसे जागी मानो किसी सपनेसे जागी हो...बड़ी हैरत से उसने मुझे एक आध पल देखा...बोली'" ओह! भूलही गयी थी कि तेरे घर सोयी हूँ...!और मै कब सो गयी? तू कब आयी सोनेके लिए? वंदन कबतक था? मै तो बस कुछ देर लेटने आयी...तू मेरे पास बैठी थी...और आगेका कुछ यादही नही...मैंने तो उसे बाय भी नही किया...चल, वो सब छोड़...तू क्यों ऐसे देख रही है मुझे....? क्या बात है? कितने बजे हैं? साढ़े छ:...ज्यादातो नही...तू बैठी हुई क्यों है? चायके लिए मेरा इंतज़ार कर रही थी क्या?? तूने ले लेनी चाहिए थी...मेरे साथ फिर एक कप....अरी बोलना....क्यों घूरे चली जा रही है...?"

अब मेरा दिल धक् से रह गया...वो वक्त आ गया था, जब मुझे उसके आगे कुछ उजागर करना था...मैंने अपने अल्फाज़ भी अभी चुने नही थे...उधेड़ बुनमेही लगी हुई थी...और ये सवालपे सवाल किए जा रही है....चाय बनाते, बनाते अपने शब्द चुन लूँ? और ये साथ आके खडी हो गयी तो...?

"निम्मी...तू.....और सोना तो नही चाह रही...मतलब उठनेकी कोई जल्दी नही है....आरामसे उठ...छुट्टियाँ मनाने आयी है...जल्दी क्या है...?" मैंने अपनी इच्छाके पूरी विपरीत बात कही...मै तो कबसे चाह रही थी कि, ये जग जाय...और अब अचानक से जाग गयी तो मै बौखला रही हूँ...

"नही तो...और कितना सो लूँगी...? मुझे तेरे साथ गप लगानी है...ऐसे मौके बार, बार थोडेही आएँगे?अच्छा चल...मै ज़रा मुँह धो लूँ....बस दो चार मिनट देदे...तूने ब्रश कर लिया? या चायके बाद करेगी? मै तो सुबह की चाय बिना ब्रश किए लेती हूँ...फिर सब कुछ....तू पानी तो चढ़ा...मै ये गयी और ये आयी..."कहते हुए निम्मी पलंग परसे उतर आयी और स्नान गृहमे घुस गयी...
मैंने रसोईकी और अपना रुख किया....किसीभी पल निम्मी बाहर आयेगी....मुझे खोयी-सी देख फिर पूछेगी...उधर वंदन इंतज़ार कर रहा होगा...वो सुबह्के नाश्तेके लिए आयेगा या नही....? निम्मीके जवाब पे मुनहसर होगा....गर उसकी द्विधा मन:स्थिती होगी तो शायद वो आना नही चाहेगा....

मै चायके उबलते पानीको घूरे चली जा रही थी और निम्मी पोहोंच गयी...
"अरे क्या कर रही है...?सुबह्से देख रही हूँ, तेरा ध्यान किसी औरही बातमे है...पानी खौलता जा रहा है और तुझे तो जैसे नज़रही नही आ रहा...चल हट...आज मै बनाती हूँ चाय....या तो बिना पत्तीकी बनाएगी या बिना दूधकी...आसार तो ऐसेही नज़र आ रहे हैं...पतिदेवका कुछ फोन आ गया क्या..??"
कहते, कहते उसने चायके प्याले भरभी दिए...ट्रे पकड़ मुझे बरामदेकी ओर ले चली....

कूर्सीपे आरामसे बैठ फिर एकबार मुझसे मुखातिब हुई," हाँ अब बोल...क्या बात है जो तू छुपाये जा रही है...? रातमे ऐसा क्या घट गया कि मेरी सखीके चेहरेपे हवाइयाँ उड़ रही हैं...अरी बोलना......?"
ये वही पुरानेवाली बेसब्र निम्मी थी....और मै संजीदा....

उसकी बाँह पे मैंने अपना हाथ रखा और बडेही स्नेह्से उसे भींच लिया....फिर अपने गालोंपे लगा लिया....और मेरे मूहसे कुछ अल्फाज़ बेसाख्ता निकल्ही पड़े...जिन्हें अब रोकना मुश्किल भी था और लाज़िम भी नही था...ऐसा करना वंदन पेभी एक दबाव बनाये रखता.....

मैंने उसकी आँखोंमे गहरे झाँकते हुए कहा, "निम्मी,तुझसे कुछ संजीदगीसे बात करना चाह रही हूँ.....ज़्यादा भुमिका नही बनाउँगी...कुछ बातें माँ-बाबूजीसे कर चुकी हूँ......अब तुझसे...कोई दबाव नही...सब निर्णय तेरेही हक़्मे होंगे, तेरीही मर्ज़ीके मुताबिक ...हम सभी तुझसे बेहद प्यार करते हैं.....बस इस बातको हमेशा अपने मनमे गाँठ बाँधके रख ले...."

"पर तू तो पहेलियाँ ही बुझाए जा रही है...मै विचलित हुए जा रही हूँ...अब बोलभी दे...जोभी मनमे है...मेरा वादा रहा कि, मै किसीभी बातको ना तो अन्यथा लूँगी या बुराही मानूँगी ....मेरे माँ-बाबूजी, तू, तेरे मेरे बच्चे, ये सब मेरे खैरख्वाह हैं...मेरा बुरा सोचही नही सकते...तो अब बता दे..."उसने खाली प्याला मेज़पे रख दिया...और मेरी शकल की ओर अपलक देखने लगी....

अब मेरे आगे कोई चाराही नही था...ना अधिक भूमिका बनानेका प्रयोजन....मै बस बोलते चली गयी....उसको पूर्व संध्यामे हुई माँ-बबूजीके साथकी बातें...बादमे वंदन के साथ हुई बातें...मेरा अपना विचार..सबकुछ, एकही साँस मे बता दिया...

निम्मी एकदम खामोश हो गयी...मैंने इसी प्रतिक्रियाकी आरम्भमे उम्मीद की थी...ना जाने उसकी आँखोंके आगेसे क्या, क्या गुज़र जायेगा...एक बिखरी ज़िंदगीके सँजोए सपने...उनका टूटना और अब फिरसे एक निर्णय...जबकि वो शायद किसी गंभीर निर्णय लेनेकी अवस्थामेही नही थी...

कुछही पल बीते, जिसके पहले कि वो कुछ बोली..पर लगा बोहोत वक्त गुज़रा....उसने मेरा हाथ अपने हाथों मे कसके पकड़ा और फिर उठके मुझे अपने सीनेसे भींच लिया.....सिसिकियाँ फूट पड़ीं.....मै उसकी पीठ सहलाती रही...एक बार लगा, माँ-बाबूजीको पहले बुला लिया होता तो शायद बेहतर होता...मैंने उसका चेहरा अपने हाथों मे लेके उससे पूछा," निम्मी, क्या तू चाहती है, कि, इसवक्त माँ-बाबूजी तेरे साथ हों? या तेरी अपनी बेटियाँ? तुझे कोई अपराधबोध तो नही हो रहा...गर ऐसा..."

वो मुझे फिर एकबार कसके बिलग गयी,बोली," नही रे....ऐसा सोचभी कैसा सकती है तू...मै तो गदगद हो गयी कि, मेरे अपनोंने मेरे लिए कितना कुछ सोचा...ऐसा किसका नसीब होता है, जो मेरा है..ऐसे सास-ससुर, ऐसे बच्चे, ऐसी सहेली और एक ऐसा बचपनका दोस्त जो मुझेही नही, मेरे ससुरालको अपनाने खड़ा है....
"मै ख़ुद लज्जित हूँ कि, मेरी तो इतनी हैसियतभी नही..... सब मेरा इतना ख़याल करें...मेरे सुखी भवितव्य के आगे अपना भवितव्य भुला दें.......मै तो वंदन काभी बड़प्पन कहूँगी कि, उसने अपने परिवारसे बात किए बिना अपना निर्णय सुना दिया...और उसपे वो अडिग रहेगा येभी जानती हूँ.....नतमस्तक हूँ इन सभीके आगे.....निर्णय अब मै मेरे हाथमे नही, आप सभीके हाथमे छोड़ देती हूँ.....जानती हूँ, एकबार मै ग़लत हो सकती हूँ, पर मेरे अपने नही...आँख मूँदके विश्वास करती हूँ...
"हाँ....मेरे पतीको भुलाना आसान काम नही...बस वो एक उम्मीद मुझसे कभी मत रखना...लेकिन आगे क्या होगा ये तो नही जानती...पर ये वादा करती हूँ, कि वो वक्त जो मैंने अपने पहले प्यारके साथ बिताया, मै भूल नही पाऊँगी...."
निम्मी काफ़ी देर भावावेशमे बोलती जा रही थी...और मुझे एक राहत मिलती जा रही थी...उसने वंदन को नकारा नही था.....इस वक्त वंदन के लिए इतनाही काफ़ी था...कुछ देर उसे शांत करके मैंने स्नानके लिए भेज दिया...और फिर सबसे पहले वंदन को फोन कर अपने घर बुला लिया...ताकि माँ-बाबूजी भोजनके समयतक पोहोंचें तो इन दोनोंकी कुछ तो आपसमे बात चीत हो सके.....

मुझे ये काम जितना कठिन लगा था, उतना नही था....अब आगे काफ़ी कुछ वंदन के रवैय्येपे मुनहसर था..उसकी संजीदगीपे काफी दारोमदार थी....
वंदन, निम्मी नहाके निकली उसके पहलेही मेरे घर पोहोंच गया....बल्कि उन दोनोको थोड़ा नाश्ता और कॉफी देनेके बादही मै नहाने चली गयी और शांती-से स्नान किया...चाह रही थीकि, उन दोनोको अकेलेमे बातचीत का मौक़ा मिले.....

खाना चाहे घरपे बना लें...चाहे इन दोनोंको बाहर भेज दें...माँ-बाबूजीके साथ एकबार वंदन को अब मिलवानाही था....एक बेटा पाके, वो खुशही होंगे....मैंने सोचा था, उससे कहीँ अधिक आसानीसे घटनाक्रम घट गया था...निम्मीका मुझपे, अपने परिवारपे , अटल विश्वास देख मै निहाल हो गयी....बार, बार उस विधाताके आगे नतमस्तक होते हुए मेरी आँखों से अविरल धारा बहती रही....

अबतो कितना कुछ करना था...वंदन को अपने माता पिताको ख़बर देनी थी...निम्मीको अपने माता पिताको..मुझे अपने नैहर और ससुरालमे.........

दोपेहरके भोजनके लिए मैंने निम्मीको अपने हाथोंसे तैयार किया...उसनेभी बिल्कुल ना नुकुर नही की...जानती थी,कि उसकी ना नुकुर सभीका मूड ख़राब कर सकती है......माँ-बाबूजीका दोनोने आशीर्वाद लिया और तब बाहर गए....मैंने उन दोनों वृद्धों को अपने आँसू पोछते हुए देखा...लड़कियाँ तो खुशीसे फूले नही समाँ रही थी....मेरे बच्चों के साथ मिल उनके तो ना जाने कितने प्रोग्राम तय होने लग गए थे.....मै चोर निगाहोंसे वंदन को देख लेती...उसकी निगाहें, निम्मीका पीछा करती रहतीं...और जब कभी उसे महसूस होता कि पकडा गया है, तो हलकेसे मुस्काके मुझे एक स्नेहभरी निगाहसे देखता....

अब एकही दुआ मेरे मनसे निकल रही थी..."हे इश्वर....अबके सब ठीकठाक करना....बस मेरे इन फरिश्तों जैसे दोस्तों के जीवन मे खुशियाँ ही खुशियाँ भर देना...माँ-बाबूजीको उनकी बुढापे की लाठी दे देना...बड़ी पुण्यात्माएं हैं.....शत शत बार तेरे दरपे नतमस्तक हूँ....अपना नज़रे करम रखना...."

एक जोश भर गया था हम सभीमे.....फेहरिस्त बनानी थी...ज़रूरी चीजोंकी..सादगीसे विधी करनी थी....फिरभी ज़रूरी नही था, कि , किसी मनहूसियत के बादल मँडराते रहें...मौक़ा तो खुशीका था...दो अत्यन्त नेक और अच्छे लोगोंको दोबारा अपना जीवनपथ सजनेका मौक़ा मिल रहा था....

मेरा नेक, पाक,साफ़ इरादा ईश्वरने मान लिया था...मंज़ूर कर लिया था...मुझे तो रहके रहके विश्वास नही हो रहा था...निम्मी और वंदन बाहर जानेको निकले तो मैंने अपनी आँखोंके काजलका टीका दोनोंके कानके पीछे लगा दिया....भगवान् इन्हें हर बद नज़रसे बचाना...
क्रमश: