सोमवार, 4 मई 2009

नेकी कर कुएमे डाल...! १

वैसे तो इस कहावत की पुष्टीकरण के लिए किस्से हजारों मिल जायेंगे ...और एक मैही नही सभीके पास होंगे....!

लेकिन कुछ ऐसे वाक़यात हैं, जिन्हें मै शायदही भुला पाउंगी....अचरज भी होता है...और फिर सोचती हूँ....मैंने इन व्यक्तियों को वैसेतो शुरुसेही जाना था...कि इनकी असलियत क्या होगी...लेकिन हमेशा यही मानके चली, कि ऐसा कौन मिलेगा जिसमे कुछ न कुछ ना खामियाँ ना हों? और हरेक रिश्ता एक क़ीमत के साथ ही आता है...हम दोस्तीको बेहद निष्कपट और पावन एहसास मानते हैं...लेकिन उसे निभानेकी ज़रूरत होती है...ऐसा नही कि, हमने जब चाहा अगला हाज़िर, वरना हम उसे भुलाए रखें...अन्य रिश्तोंकी तरह, इसेभी हमें अपने प्यार और स्नेह्से सींचना ही होता है...बेहद एहतियात बरतनी होती है...और ये एक रिश्ता ऐसा है,कि, ज़रासीभी लापरवाही बर्दाश्त नही कर पाता...कोमल पौधेके तरह...

जब मै अपने अंतरमे झाँक के देखती हूँ,तो पाती हूँ, कि, मैंने अक्सर ऐसे रिश्ते बेहद मेहनतसे निभाएँ हैं....और अपनी पीठ थपथपाने के लिए नही कह रही...वरना अपने बारेमे अन्य सत्य मान लिए , मै इसेभी मान लेती...

सबसे प्रथम, अपनेआपको तकरीबन २१ साल पहले ले चलती हूँ....जब मेरी वाकफ़ियत एक महिलासे हुई...वो महिला थी मेरे बच्चों के स्कूल की मुख्याध्यापिका....बस तभी हम उस शेहेरमे पोहोचे थे....बच्चों के प्रवेशके ख़ातिर मै उसके साथ मिली। बच्चों ने प्रवेशके लिए जो ज़रुरियात थे वो पूरे किए...जैसे गणित और इंग्लिश की लिखत परिक्षा।
वैसे मुझे इशारतन कहा गया कि, इस स्तर के अधिकारियों के बच्चों को, जो तबादले पे आते हैं, स्कूलों को प्रवेश देना बंधनकारक होता है...प्रवेश के समय कोई परीक्षा नभी दें तो चलता है। खैर, मै इन बातों मे नही विश्वास रखती थी...गर इतना गुमान है तो फिर ऐसेमे अफसरों ने सरकारी स्कूलोंमे अपने बच्चों का दाखिला करा लेना चाहिए।

सौभाग्यवश, मेरे दोनों बच्चे आसानीसे दाखिला पा गए।

मुख्याध्यापिका हँसमुख थी...थोड़ी बालिशभी...पर जैसे मैंने कहा, हरेकमे कुछ न कुछ स्वभाव विशेष होतेही हैं...उसमे ये था..अन्य गुण भी थे...अपनी स्कूलके हर बच्चे को वो नामसे जानती थी। येभी था,कि, अपनी हर विशेषता उसे ज़ाहिर करनेकी इच्छा रहती। अपनी ओर ध्यान हरवक्त आकर्षित करना उसे हमेशा अच्छा लगता...शायद एक बच्चे की तरहसे...कभी कबार मेरी बिटिया इस बातसे काफ़ी चिढ -सी जाती...उसे लगता, मैडम हमेशा अपनेही बच्चों के बारेमे बात करती रहती हैं...या फिर बड़े फख्र से वो बताती कि, उसे आजभी गुडियों से खेलना पसंद है..पलभर मुझेभी ज़रा अजीब-सा लगा..लेकिन पल भरही ...उसने जैसेही मुझसे कहा," जानती हो, मुझे लता कहती है कि, मै अपरिपक्प हूँ ! "
मैंने झटसे उत्तर दिया," हम सभीमे कुछ ना कुछ बचपना होताही है...कुछ उसपे परदा डाले रखते हैं, कुछ नही डाल पाते...!"

हम दोनोकी दोस्ती के चर्चे उस स्कूलसे बाहर निकल उस शेहेरमेभी मशहूर हो गए। शेहेर कोई महानगर तो था नही...और येभी हुआ कि, हमने अपने बच्चे उस स्कूलमे डाले...जबकि, उससे पूर्व हरेक अधिकारीके बच्चे एक अन्य स्कूलमेही डाले जाते...उस सालके बाद ये प्रथा बदल गयी...सभी उसी स्कूलमे प्रवेश पानेकी ख्वाहिश रखने लगे...और वो महिला स्कूलको अपने एक अपत्य के नज़रसेही देखा करती...

स्कूल उसीके पिताकी ओरसे शुरू की गयी थी। शादीके बाद वो मुम्बईमे बस गयी थी। इतनाही नही, उसकी स्कूली और महाविद्यालयीन पढ़ाई भी मुम्बईमे हुई थी। उसके पती एक बैंक मे कार्यरत थे। जब ये स्कूलकी शुरुआत हुई तब कोई अन्य महिला मुख्याधिपिका बनी। बादमे पता चला कि, उसके पास कोई सही कागजात नही थे, जो, उसकी पढाई कितनी हुई और कहाँ हुई इस बातको बताये...! खैर...! उसे निकालें तो पर्यायी तौरपे दूसरा कोई होना ज़रूरी था...
मेरी इस सहेलीने Be.Ed. किया हुआ था...अपने पिताकी स्कूल मे मुख्याधिपाका बन जानेके बाद उसने M.Ed भी कर लिया।

मुम्बई छोड़ आनेके बाद उसके पतीने, उसी स्कूलमे, बिना वेतन, गणित और शास्त्र विषय पढ़ने शुरू किए। उसे अपने बैंक की नौकरी छोड़नी पड़ी। सहेलीके पिताकी शराबकी दुकान थी। उसका एक भाईभी था, जोकि, उसी शेहेरका बाशिंदा था। उसके इर्द गिर्द जिन लोगों का उठना बैठना था, उस बारेमे मै कुछ ना कहूँ तोही ठीक होगा। अपने परिवारसे उसका कमही नाता रहा था।

एक बेहेन थी, जो मुम्बईमे C.A. थी...उसके जीजा, एक बड़ी मल्टी national कम्पनीमे कार्यरत थे। उन्हें स्कूलके boardpe लिया गया था। बल्कि, वो चेयरमैन थे।
एक समय ऐसा आया...उसी साल, जिस साल हम उस शेहेरमे आए...जब पिताकी जायदाद के बंटवारे की बात सामने आने लगी। सहेलीके पतीको अपनी पत्नीके कामके कारण अपनी बैंक की नौकरी छोड़ देनी पड़ी थी। वो उसी स्कूलमे बिना वेतन अपनी सेवायें दे रहा था। खैर मुद्देकी बातपे सीधे आ जाती हूँ। वो शराबकी दुकान उसके नामपे होना ज़रूरी था, वरना उसकी उपजीविकाका क्या साधन होता? मैंने ये बात उसके पिताको बडीही शिद्दतके साथ समझायी...जबकि, बाप बेटीमे तकरीबन बोलचाल बंद हो गयी थी। दुकान उन्हों ने उसके नामपे कर दी...ये बातभी मान ली, कि, गर शायद मै दख़ल नही देती वो इस ओर गौर नही करते...
क्रमशः

4 टिप्‍पणियां:

  1. शमा जी,
    आप यादों को अगर कलमबंद करती हैं तो बधाई की हकदार हैं क्योंकि आपबीती में रोचकता की चाशनी पैदा करना मुश्किल फन है. और अगर यह कल्पना है फिर तो एक ही जुमला कहूँगा- ' कमाल है.' वैसे मैं ९८% आश्वस्त हूँ कि यह आपकी यादें हैं. अच्छा....नहीं...बहुत अच्छा लिखने के लिए बधाई बहुत छोटा शब्द लग रहा है.

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  2. kamal hai....aap dainik baton ko badi hi aasani se kaise likh pati hai.....?? kya kahu aapne to shayad lakhni ko hi aapni jindgi bana liya hai.....!!!

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  3. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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