शुक्रवार, 5 जून 2009

बोले तू कौनसी बोली ! ३

४/५ साल हो गए इस घटनाको...मै अपनी किसी सहेलीके घर चंद रोज़ बिताने गयी थी। सुबह नहा धोके ,अपने कमरेसे बाहर निकली तो देखा, उसकी सासुजी, खाने के मेज़ पे बैठ ,कुछ सब्ज़ी आदि साफ़ कर रही थीं.......१२ लोग बैठ सकें, इतना बड़ा मेज़ था...बैठक, खानेका मेज़ और रसोई, ये सब खुलाही था...

मै उनके सामने वाली कुर्सी पे जा बैठी...तबतक तो उन्हों ने सब्ज़ी साफ़ कर,आगेसे थाली हटा दी...मेरे आगे अखबार खिसका दिए और, फ़ोन बजा तो उसपे बात करने लगीं....

उसी दिनकी पूर्व संध्या को, मै मेरी अन्य एक सहीली के घर गयी थी...ये सहेली उस शेहेर के सिविल अस्पताल मे डॉक्टर थी। उसने बडीही दर्द नाक घटना बयान की...और उस घटना को लेके बेहद उद्विग्न भी थी...मुझसे बोली,
" कल मै रात की ड्यूटी पे थी....कुछ १० बजेके दौरान ,एक छोटी लडकी अस्पताल मे आयी...बिल्कुल अकेली...अच्छा हुआ,कि, मै उसे आपात कालीन विभाग के एकदम सामने खडी मिल गयी...उसकी टांगों परसे खून की धार बह रही थी....उम्र होगी ११ या १२ सालकी...

"मै उसके पास दौड़ी और उसे लेके वार्ड मे गयी...नर्स को बुलाया और उससे पूछ ताछ शुरू कर दी...उसके बयान से पता चला कि, उसपे सामूहिक बलात्कार हुआ था...जो उसे ख़ुद नही पता था...उसे समझ नही आ रहा था,कि, उन चंद लोगों ने उसके साथ जो किया,वो क्यों किया...इतनी भोली थी.....!अपने चाचा के घर गयी थी...रास्ता खेतमे से गुज़रता था...पढनेके लिए, अपने मामा और नानीके साथ शेहेर मे रहती थी...शाम ६ बजे के करीब लौट रही थी..."उस" घटना के बाद शायद कुछ घंटे बेहोश हो गयी...जब उसे होश आया तो सीधे हिम्मत कर अस्पताल पोहोंची....नानी के घरभी नही गयी....उसे IV भी चढाने लगी तो ज़रा-सा भी डरी नही...

मै जानती थी,कि,ये पोलिस केस है...अब इत्तेफाक से मेरे पती यहाँ पोलिस विभाग मे हैं,तो, मैंने उसकी ट्रीटमेंट शुरू करनेमे एक पलभी देर नही की...
"वैसेभी, हरेक डॉक्टर को प्राथमिक चिकित्चा के आधार पे ट्रीटमेंट शुरू करही देनी चाहिए...बाद मे पोलिस को इत्तेला कर सकते हैं..मैंने अपने पती को तो इत्तेला करही दी...लेकिन, अस्पताल मे भी पुलिस तैनात होती ही है...
वहाँ पे चंद मीडिया के नुमाइंदे भी थे..अपने साथ कैमरे लिए हुए...!

"यक़ीन कर सकती हो इस बातका, कि, उतनी गंभीर हालात मे जहाँ उस लडकी को खून चढाने की ज़रूरत थी...वो किसी भी पल shock मे जा सकती थी..मैंने ओपरेशन थिएटर तैयार करनेकी सूचना दी थी...उसे टाँके लगाने थे...और करीब ३० टांकें लगे...इन नुमाइंदों को उसका साक्षात् कार लेनेकी, उसकी फोटो खींचने की पड़ी थी...?
नर्स और वार्ड बॉय को धक्का देके..... पुलिस कांस्टेबल को भी उन ३/४ नुमाइंदों ने धक्का मार दिया..., उसके पास पोहोंच ने की कोशिश मे थे....! वो तो मैंने चंडिका का अवतार धारण कर लिया...उस बच्ची को दूसरे वार्ड मे ले गयी...स्ट्रेचर पे डाला,तो उसके मुँह पे चद्दर उढ़ा दी...वरना तो इसकी फोटो खिंच जानी थी ...!"

इतना बता के फिर उसने बाकी घटना का ब्योरा मुझे सुनाया...मै भी बेहद उद्विग्न हो गयी..कैसे दरिन्दे होते हैं...और हम तो जानवरों को बेकार बदनाम करते हैं...! जानवर तो कहीँ बेहतर...! पर मुझे और अधिक संताप आ रहा था, उन कैमरा लिए नुमाइंदों पे...! ज़रा-सी भी संवेदन शीलता नही इन लोगों मे? सिर्फ़ अपने अखबारों मे सनसनी खेज़ ख़बर छप जाय...अपनी तारीफ़ हो जाय, कि, क्या काम कर दिखाया ! ऐसी ख़बर तस्वीर के साथ ले आए...! सच पूछो तो इस किस्म की संवेदन हीनता का मेरा भी ये पहला अनुभव नही था...जोभी हो!

मै जिनके घर रुकी थी, रात को वहाँ लौटी तो मेरे मनमे ये सारी बातें घूम रही थीं...सुबह मेज़ पेसे जब अखबार उठाये,तो बंगाल मे घटी, और मशहूर हुई एक घटना का ब्योरा पढ़ने लगी...उस "मशहूर" हुए बलात्कारी को सज़ा सुनाई गयी थी, और चंद लोगों ने उसपे "दया" दिखने की गुहार करते हुए मोर्चा निकाला था...ये ख़बर भी साथ, साथ छपी थी...! दिमाग़ चकरा रहा था....!

इतनेमे मेरी मेज़बान महिला फोन पे बात ख़त्म कर मेरे आगे आके बैठ गयीं और बतियाने लगीं," आजकल रेपिंग भी एक कला बन गयी है..."

मैंने दंग होके उनकी ओर देखा...! क्या मेरे कानों ने सही सुना ?? मेरी शक्ल पे हैरानी देख वो आगे बोली," हाँ! सही कह रही हूँ...हमलोग तो लड़कियों को ये हुनर सिखाते हैं....!"
कहते,कहते वो, अपनी कुर्सी के पीछे मुड़ के बोलीं ," अरे ओ राधा...ठीक से रेप कर...अरे किसन...तुझे मैंने रेप करना सिखाया था ना...अरे ,तू मेरा मुँह क्या देख रहा है...सिखा ना राधा को...करके दिखा उसको...राधा, सीख ज़रा उससे...ठीकसे देख, फिर रेप कर...!"

मेरी तरफ़ मुडके बोली," कितना महँगा पेपर बरबाद कर दिया...! ज़रा मेरा ध्यान हटा और सब ग़लत रेप करके रख दिया...!"

अब मेरी समझमे आने लगा कि, उस बड़ी-सी मेज़ के कुछ परे, एक कोनेमे,( जो मुझे नज़र नही आ रहा था, और पानी चढाने की मोटर चल रही थी, तो कागज़ की आवाज़ भी सुनाई नही दे रही थी), उनके २ /३ नौकर चाकर , कुछ तोहफे कागज़ मे लपेट रहे थे!

उनके पोते का जनम दिन था ! जनम दिन पे आनेवाले "छोटे" मेहमानों के खातिर, अपने साथ घर ले जानेके लिए तोहपे, "रैप" किए जा रहे थे! ! इन मेज़बान महिला का उच्चारण "wrap"के बदले "रेप" ऐसा हो रहा था....और मै अखबार मे छपी ख़बर भी पढ़ रही थी....तथा,पूर्व संध्या को सुनी "उस" ख़बर का ब्योरा मनमे था...उस घटना के बारेमे ख़बर भी वहाँ के लोकल अखबार मे छपी थी..मैंने उसे भी पढा था..ग़नीमत थी,कि, लडकी का नाम पता नही दिया था...! ज़ाहिर था, उन्हें मिलाही नही था...!

लेकिन चंद पल जो मै हैरान रह गयी, उसका कारण केवल मेरे दिमाग़ का" अन्य जगह" मौजूद होना था...वरना, मुझे इन उच्चारणों की आदत भी थी.....!
क्रमश:

( अब वर्तनी को बेहद ध्यान से चेक किया है...कहीँ मेरे लेखन मे भाषाको लेके कुछ "ग़लत फ़हमी" ना उभरे!)

11 टिप्‍पणियां:

  1. रोचकता से भरपूर प्रसंग। अगले अंक की प्रतीक्षा।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  2. इतने दर्निदों से भरा है ये समाज कि मेरा तो खून खौल उठता है ....ये मीडिया वाले भी बलात्कारी ही हैं ...एक हुए बलात्कार को दोबारा उसे बलात्कार करते हैं .....

    मेरा दिमाग ख़राब सा हो गया ये सब पढ़ कर ...उस बच्ची पर न जाने क्या गुजरी होगी

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  3. ऐसी कितनी ही मासूम लड़कियाँ और औरतें दुनिया मे हैं, जिनके बारेमे कभी कुछ कहाही नही गया...नाही सुना गया...और नाही मुँह खोलने की ता-उम्र उन्हें इजाज़त ही मिली....रात दिन अत्याचार सहती रहीँ , लेकिन, उस "अत्याचार" को उनके अपने घर वालों ने, समाजने "जायज़" माना !
    ये सच है,कि, नुमाइंदे क्या, न्यायालयों मे वकील भी, ऐसी महिलाओं को इतना अपमानित और शर्मिन्दा करते हैं, जिसकी हद नही...! तथा उस केस की ख़बर रोज़ अखबारों मे छपती है... जिसके साथ अपराध हुआ, वो ख़ुद एक अपराधबोध तले दब जाती है..
    मैंने बात तो भाषा विषय पे निकाली.....लेकिन, लिखते समय, मै ख़ुद, उस घटनाके ब्यौरे को याद कर, उद्विग्न हो गयी....
    अनिल जी ने लिखी टिप्पणी का ये उत्तर है...

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  4. शमा जी, मैं खुद अदालत में हूँ इसलिए जानता हूँ की ऐसे हादसे सिर्फ उस लडकी को नहीं बल्कि उसके पूरे परिवार के लिए अभिशाप की तरह बन जाते हैं......अफ़सोस की आज भी हम इन हैवान बने इंसानों से उस सख्ती से नहीं निबट पाते जिससे निबटना चाहिए....

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  5. शमा जी, यह अशिक्षा तो है ही लेकिन हमारे नपुंसक कानून का भी इस में बहुत बड़ा योगदान है. आरोप साबित करने में ही लम्बा अरसा गुजर जाता है और फिर अगर हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट तक जाना हो तो जिंदगी साथ दे न दे. 'शिकार' के साथ समाज का जो रवैया होता है, उस पर कुछ भी कहना, अपने जबान गंदा करना है.
    आप की लेखनी का कमाल है कि अभी तक आक्रोश में हूँ. आपका हुनर बरकरार रहे और आप अपने संस्मरणों में से ऐसे ही आग तलाश कर सामने लाती रहें, शायद कुछ भेड़ियों को गलती का एहसास हो और सत्ता में बैठे माननीयों को नारी की अस्मत के महत्व का अंदाजा हो.

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  6. शमा जी, यह अशिक्षा तो है ही लेकिन हमारे नपुंसक कानून का भी इस में बहुत बड़ा योगदान है. आरोप साबित करने में ही लम्बा अरसा गुजर जाता है और फिर अगर हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट तक जाना हो तो जिंदगी साथ दे न दे. 'शिकार' के साथ समाज का जो रवैया होता है, उस पर कुछ भी कहना, अपने जबान गंदा करना है.
    आप की लेखनी का कमाल है कि अभी तक आक्रोश में हूँ. आपका हुनर बरकरार रहे और आप अपने संस्मरणों में से ऐसे ही आग तलाश कर सामने लाती रहें, शायद कुछ भेड़ियों को गलती का एहसास हो और सत्ता में बैठे माननीयों को नारी की अस्मत के महत्व का अंदाजा हो.

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  8. शमाजी ,
    आपकी रचना में एक ओर शब्द के गलत उच्चारण के कारण हास्य का अहसास हुआ तो दूसरी तरफ समाज में फ़ैली बुराई को देखकर मन दुखी हो गया ,आज इस प्रकार की घटनाएँ आम होती जा रही हैं ,हमारा मीडिया अपना टी आर पी बढाने के लिए मार्मिक प्रसंगों को भी इस प्रकार प्रस्तुत करता है कि आत्मा तक रो जाती है ,पढ़कर मन कराह उठा ------|

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  9. शमाजी ,
    आपकी रचना में एक ओर शब्द के गलत उच्चारण के कारण हास्य का अहसास हुआ तो दूसरी तरफ समाज में फ़ैली बुराई को देखकर मन दुखी हो गया ,आज इस प्रकार की घटनाएँ आम होती जा रही हैं ,हमारा मीडिया अपना टी आर पी बढाने के लिए मार्मिक प्रसंगों को भी इस प्रकार प्रस्तुत करता है कि आत्मा तक रो जाती है ,पढ़कर मन कराह उठा ------|

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  10. कलम की सवेंदनशीलता आपके इशारों पर नाचती है, सोना हर परिस्थिति में सोना ही रहता हैं, आप इस बात को सिद्ध कर रही हैं। लगातार नया पाठक वर्ग आपसे जुड़ रहा है। ये पोस्ट बहुत ही हृदय-विदारक घटना से भीगी हुयी थी। आप फिर से अच्छा लिख रही है, ये देखकर कितना अच्छा लगता है। मुझे लगता अब कोई अच्छी सी श्रृखला लेकर आप आने वाली हैं। मुझे लगता है आप उन चुनिंदा ब्लागरों में से एक हो जिन्होने अपनी लम्बी श्रृखला से पाठकों को बहुत समय तक बांधे रखा। ये कलम का जादू ही था। श्रृंखला के अतं में आपके निजी जीवन और लेखन दोनों में असर दिखायी दिया। लेकिन सवेरा किसी रात के बाद ही होता हैं।

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  11. sami,yebhi to ek sacchai hi hai .sacchai kadvi hoti hai magar sacchai sacchai hoti hai .aapka blog bahut accha laga .khuda kare aap aisihi likhti rahe

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