बुधवार, 17 जून 2009

बोले तू कौनसी बोली ? ४

काफ़ी साल हो गए इस घटनाको...बच्चे छोटे थे...हमारे एक मित्र का तबादला किसी अन्य शेहेर मे हो गया। हमारा घर मेहमानों से भरा हुआ था, इसलिए मेरे पतीने उस परिवार को किसी होटल मे भोजन के लिए ले जाने की बात सोची।

एक दिन पूर्व उसके साथ सब तय हो चुका था... पतीने उससे इतना ज़रूर कहा था, कि, निकलने से पहले, शाम ७ बजेके क़रीब वो एकबार फोन कर ले। घरसे होटल दूर था...बच्चे छोटे होने के कारण हमलोग जल्दी वापस भी लौटना चाह रहे थे।

उन दिनों मोबाईल की सुविधा नही थी। शाम ७ बजे से पहलेही हमारी land लाइन डेड हो गयी...! मेरे पती, चूंकी पुलिस मेहेकमे मे कार्यरत थे, उन्हों ने अपने वायरलेस ऑपरेटर को, एक मेसेज देके उस मित्र के पास भेजा," आप लोगों का सहपरिवार इंतज़ार है..."

हमारे घर क़रीब थे। ऑपरेटर पैदल ही गया। कुछ देर बाद लौटा और इनसे बोला," उन्हों ने फिर एकबार पूछा है..उन्हें मेसज ठीक से समझ नही आया..."
हम दोनों ही ज़रा चकित हो गए...मैंने इनसे कहा," आप एक चिट्ठी लिख दें तो बेहतर न होगा?"
"अरे, इतनी-सी बात है...उसमे क्या चिट्ठी लिखनी?"
इतना कह,इन्हों ने फिर एकबार अपनी बात उस ऑपरेटर के आगे दोहरा दी।
ऑपरेटर जाके लौट आया। हमारा फोन तो डेड थाही। तकरीबन ९ बजे उसमे जान आयी...एक हलकी-सी'ट्रिंग" की आवाज़ मुझे सुनाई पड़ी...! मैंने इन्हें झट अपने मित्र को फोन करने के लिए कहा...
इन्हों ने फोन घुमाया," अरे यार! क्या हो गया है तुम लोगों को? हम शाम ७ बजे से इंतज़ार कर रहे हैं...अब ९ बजने आए...! कहाँ रह गए हो? हमसे ज़्यादा तो तुझे जल्दी थी, बच्चों के कारण.....!"

" लेकिन तूने तो कहा था,कि, बस हमही लोग हैं...तूने ये औपचारिकता क्यों कर दी? और लोगों को क्यों बुला लिया?" हमारे मित्र ने कुछ शिकायत के सुर मे कहा पूछा।

"लेकिन तुझे किसने कह दिया कि, और लोगों को आमंत्रित किया है? बस तुम लोग हो और हम चार...! "मेरे पती ने कहा...

"अरे यार ! मैंने तो दो बार पुछवाया, कि, और कौन आनेवाला है, और तू कहता रहा,'सफारी पेहेन के बुलाया है'...अब सफ़ारी सूट तो औपचारिक आयोजनों मे पहना जाता है..मै तो कुरता पजामा पेहेन आनेवाला था...मेरी बीबी अब सफ़ारी पे इस्त्री कर रही है....!"

"अरे भैया , तुझे किसने कहा 'सफ़ारी' पेहेन के आने को....? अब जैसा है वैसा ही आजा..." इनकी आवाज़ शायद कुछ अधिक बुलंद हुई होगी, क्योंकि, उसकी पत्नी ने सुन ली...!

इनके मित्र ने जवाब दिया," यार, अब मेरी बीबी कह रही है, इतनी मुश्किल से तो ये सूट ढूँढा...कहाँ loft पे पडा मिला...अब यही पहनो...उसने इस्त्री भी की है...खैर, आते हैं हमलोग..बस और ५ मिनिट दे दो...!"
मुझे ये सँवाद सुनाई पड़ रहा था, और बात समझ मे आने लगी तो मेरी हँसी छूटती जा रही थी, और इन्हें गुस्सा चढ़ता जा रहा था..!

इन्हों ने ओपरेटर को बुला के डाँटना शुरू किया," कमाल है तुम लोगों की...इतना सीधा मेसेज समझ नही सकते..वायरलेस पे क्या समझते होगे? मै "सेह्परिवार" कहता चला जा रहा था, और तुम "सफ़ारी" सुन रहे थे?"

अब ये 'उच्चारण 'का भेद मुझे समझ मे आ रहा था... मराठी मे "सह परिवार" इसतरह उच्चारण होता है, जबकि, ये 'सेप्ररी वार "...इस तरह से उच्चारण कर रहे थे...और वो लड़का उसे 'सफ़ारी" सुन रहा था...!

मैंने अपने पती का गुस्सा शांत करने के ख़ातिर कहा," आप अपने आपको चंद रोज़/माह आगे कर के देखो...आपको ख़ुद इस बात पे हँसी आयेगी...तो अभी ही क्यों न हँस लें?"

खैर! मेरा वो प्रयास तो असफल रहा...लेकिन, ये सच है,कि, चंद रोज़ बाद इसी बात को याद कर हम सब खूब हँस लेते थे...जब कभी अपने अन्य दोस्तों को बताते....बडाही मज़ा लेके बताते...अब तो जब सफ़ारी की बात निकलती है, हम उसे 'सह परिवार' कहते हैं, और जब 'सह परिवार' की बात होती है तो उसे 'सफारी' कह लेते हैं....ख़ास कर मै ख़ुद!

3 टिप्‍पणियां:

  1. SHAMA JI ZINDAGI JEENE KA NAAM HAI mushkilen toh aati rehti hai aur jab mushlilan aati hai hum sochna bandh kar dete hai aur bas darne lagte hai apne liye jeyo aur kuch rahoge

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  2. shama ji kuch rehne ki karan doono dukhi hone ke nahi jab mushkil ati hai toh bina batae aati aur hum us ka samana karne ke vajaye darte hai jo nahi karna chaiye aap ko mere blog par kavita uar photo acha laga dhanyabad

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  3. bahut din baad aapke blog per aayaa hoon . ek to apne kaam main bahut vyast tha aur doosre do din se net bhi kaam nahi kar rahaa tha . khair --- bole tu ka -- pahalaa bhag (bhoot waalaa) main padh chukaa tha aaj baaki teen bhi ek saans main padh gayaa . ji wo rochak hi itne adhik hain. haansi aur gyaan ke saath aankhein bhi NAM ho gaie . wo bachchi waali baat pe. taras aataa hai aaj ki patrakaarita pe ! kya ho gayaa hai in logon ko kya isi ko khabar kehte hain ?
    is baat ne aapka ye dava bhi hava kar diya ki aap halkaa fulka likh sakti hain. aji dard to musalsal behtaa bhav hai jab labalab hua beh gayaa. shayad isiliye is halke fulke (magar gyaanwardhak bhi) sansmaran main bhi dard aa hi gayaa. sach poochhiye to ham chakar bhi ise rok nahi sakte. aap apni zindagi ka sansmaran likhne baithi hain to dard ko kaise pare rakh sakti hain wo chahe apnaa dard ho ya hamaare kisi ka ya kisi anjaan ka. meri baat ko anythaa na lena . waise sansmaran hai badaa rochak yahi kaaran hai ki ek saans main teeno padh gayaa. seedhi sachi baat belaag kahne ke liye badhaai.

    ab baat kahaani ke ant waali -
    maaf karnaa bahut der main jawaab de rahaa hoon. main anuvaad main vyast hotaa hoon sirf deadline yaad rahti hai baaki sab baatein bhool jaataa hoon . khair --

    aap ek blog banaaiye - kahaani ka ant bataaiye--- ke naam se ya aise hi kisi naam se .
    uski post ko apne baaki sab blog per bhi post keejiye .
    chaaho to apne sabhi paathkon ko bhi aissa karne ke liye kah sakti ho .
    aisaa karne se chtthjagat ke maadhyam se uskaa khoob prachaar ho jaayega.
    hind yugm jaisi website per bhi prachaar kiya ja saktaa hai. magar wahaan shayad kuchh paise dene padein.
    ye kaam mere jaise paathak bhi apne mail se bhi kar sakte hain.
    aap itnaa keejiye shayad kuchh baat ban jaaye. mujhe to lagtaa hai aisaa karne se khoob prachaar ho jaayega.
    pataa nahi main aapko samjhaa paayaa hoon ya nahi ?

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