गुरुवार, 28 मई 2009

नेकी कर, कुएमे डाल ! ६

"सखी, जानती हूँ, मेरे लिखेमेसे तुम कुछभी नही पढ़नेवाली...लेकिन यही एक तरीक़ा नज़र आ रहा था, तुमसे अंतरंग खोलके बतियानेका....हम बरसों अपनी दोस्तीका जनम दिन मनाते रहे...कभी नही सोचा था मैंने कि , तुमसे बात करना एक दिन असंभव हो जायेगा...तबतक, जबतक, तुम ना चाहो.....!मै बता नही सकती,कि, मन कितना कचोटता है...के, ये सब कितना अविश्वनीय-सा लगता है...लेकिन पिछले कुछ अरसेसे, अविश्वसनीय घटनायों का मानो, एक सिलसिला-सा बन गया है...!

"उस रात, स्वागत समरोह्के पश्च्यात, तुम मेरे कमरेमे बैठ बोहोत रोयीं...तुम्हें मुझसे बेहद शिकायत थी...इस बातकी ,के, मैंने "उस" सहेलीको अपमानित क्यों नही किया...वोभी सबके सामने! के तुम्हें, किसीसे कोई अपमानजनक बात सुन लेनेकी आदत नही थी...कि, जिस समारोहका वो हिस्सा होगी, वहाँ,तुम कभी नही आओगी....के उसे कह दूँ, वो मेरे सारे आयोजनेसे बाहर हो जाए...चली जाय अपने घर......!

"बात तो बेहद बचकानी-सी थी...तुमने मेरे कमरेकी चाभी उसके हाथ नही पकडाई..लेकिन उसके सामने, किसी अन्य के हाथ...! उसने तो मज़ाक़ ही , मज़ाक़ मे कह दिया,'अब तो पकडानी पड़ी न...तो मुझेही पकडा देतीं...मै तो इस परिवारको तुम्हारे छ: साल पेहेलेसे जानती हूँ!'
"इतनी-सी बातपे तुम बिफर पड़ीं...साथवाले कमरेमेसे वो सब सुन रही थी..लेकिन तुम्हें परवाह नही थी...तुमने ये तक कह दिया कि, मुम्बई हवाई अड्डे से तुम अपने पतीके साथ सीधे अपने शेहेर की ओर रवाना हो जाओगी..तथा, मेरे पुत्र की शादी मेभी शामिल नही होगी, गर,'वो' शामिल होनेवाली हो तो..!मेरे पुत्रकी शादीकी बात कहीँ हवामेभी नही थी...!

"मैंने तुमसे कहा,'ठीक है, मैभी तुम्हीँ लोगोंके साथ, तुम्हारेही शेहेर चलती हूँ...मुम्बई मे होनेवाले, दो अलग,अलग,स्वागत समरोह्की पूरी तैय्यारियाँ तो होही चुकी थीं...लड़कीकी मासी, नानी, पिता, मोर्चा सँभाल लेंगे!'....तुम्हें मै ऐसी मनास्थितीमे कैसे छोड़ सकती थी..हैना?

"तुमने कहा,कि, मै ब्लैक मेल कर रही हूँ...बल्कि, वैसा नही था...तुम गर नही रुकती, तो मै तुम्हारे साथ,तुम्हारे शेहेर चलीही जाती...
हर उस व्यक्तीने ,जिसने तुम्हारी बातें सुनी, उन्हें वो बेहद बचकानी और अपरिपक्व लगीं...लेकिन मैंने तुम्हारा साथ दिया और, उस सहेलीकी समझदारीपे विश्वास किया...जानती थी, कि, उसमे वो परिपक्वता है...खैर, तुम उन लोगों के साथ मुम्बई लौटके मेस मे नही रुकीं...जबकि, मेरे अपने माता-पिता, तथा अन्य सभी, दोस्त रिश्तेदार वहीँ रुके थे...तुम्हें मै अपने घर ले आयी...

जिस दिन शाम हम, मुम्बई पहोंचे, उसकी अगली शाम एक छोटा -सा समारोह, करीबी लोगोंके लिए आयोजित किया था...तुम अपनी जान पहचान की हेयर ड्रेसर के पास बिटियाको ले गयीं...उसने सुंदर केशसज्जा कर दी...

मैंने दूसरे दिनके, अधिक बड़े स्तरपे रखे स्वागत समारोह्के लिए, उसी होटलमे, सुबह्से दो कमरे बुक कर लिए थे...सुबह वहीँ पहोंच,आरामसे, नहा धो तैयार होके, नीचे समरोह्की जगेह्पे शांती से चले जानका इरादा था.... बिटियाभी घरके शोर-गुलसे बाहर निकलना चाह रही थी, अमरीका मे रहते, रहते, इस तरह के भारतीय माहौल की आदत, उसके लिए ख़त्म-सी हो गयी थी,जो माहौल मुझे बेहद भाता था......आसपास खूब लोग हों..खुले दरवाजें हों, मेरे घरके, हर वक्त एक सुंदर मिलन की बेला हो !.........
लेकिन, इसकी केशसज्जा बिटियाको भा गयी...उसने,शाम वहीँ जाके पहले केशसज्जा कर,फिर आयोजनके स्थलपे जानेकी ठान ली....मैंने बार, बार कहा, कि, उस पार्लर मे एक बार फोन करके appointment पक्की कर लेनी चाहिए...पर तुम्हें पूरा भरोसा था,कि, तुम्हें देखतेही वो बिना किसीपूर्व सूचनाके, बिटियाके बाल सँवार देगी....लेकिन ऐसा नही हुआ..जब हम वहाँ पोहोचे तो उसने साफ़ कह दिया,'देखते नही मै इस वक्त किसी ओरके बाल सेट कर रही हूँ...मुझे कमसे कम ४०/५० मिनट और लगेंगे..!'

"अब मै ऊँची नीची होने लगी...उस जगेह्से आयोजनका स्थल डेढ़ घंटेके फासलेपे था....गाडी तो एकही थी...ना मै आगे निकल सकती थी, ना उसे पीछे छोड़ सकती थी...अजीब असमंजस की अवस्था थी...घड़ी, टिक,टिक करते आगे बढ़ती जा रही थी...मेरे पतीके मुझे तीन बार फोन आ चुके, कि,हमारा आयोजन स्थलपे प्रस्थान हुआ या नही....!
अंतमे हमने सीधे आयोजनके स्थलपे प्रस्थान किया...भारत क्या, जगप्रसिद्ध होटल था..लेकिन वहाँ उस दिन हेयर dresser आयी नही थी....! उस कामको जिस व्यक्ती पे सौंपा था,जैसे कि, वहाँ के ऐसे सारे इन्तेज़ामात, वो व्यक्ति तो अपने घरसेही नही निकला था..उसे पोहोचनेमे अभी एक घंटा और था!!

अब मेरी बिटिया मुझपे बिगड़ गयी...जबकि, मेरी कोई कहीँ गलती नही थी...वो तो बिटियाकी चचेरी बेहेनने बड़े डरते,डरते, उसका जूडा बना देनेका काम हाथमे लिया..साडीभी उसीने पहनाई...मुझे एक के बाद एक बुलावे आते जा रहे थे...तुंरत नीचे चली आओ...खैर, मै नीचे पोहोंच गयी...अपने आपको भरसक शांत रखा....वैसेभी ऐसे मॉकों पे अपना संतुलन खोके कुछ हासिल नही होता....मेरी बेहेन को ज़रूर दुःख हुआ, जिस तरहसे बिटिया बिगड़ पड़ी, क्योंकि उसमे मेरा कहीँ भी , कुछभी दोष नही था...

स्वागत समारोह शुरू होनेके बाद तो ठीक ठाक होही गया...उसके अगले दिन बिटिया अपने ससुराल लौट गयी...और तुम अपने घर....शादीका घर धीरे,धीरे खाली होने लगा....

उसके बाद, तुम्हारेही शेहेरमे आयोजित, महाराष्ट्र राज्य पुलिस गेम्स का आयोजन...मुम्बैई मे पुस्तकोंका प्रकाशन , तो दूसरी ओर हमारी अपने घरकी खोज...और अंतमे हमारा ,पतीके अवकाश प्राप्ती के बाद ,पुनेमे प्रस्थान..
और फिर मेरे जीवन घटी चंद अवांछित घटनायों का सिलसिला...मै भी, अपनेआपमे, शारीरिक और मानसिक रूपसे बेहद थक चुकी थी...

शादी के बाद, बिटिया दो बार आयी...और अन्तिम बार जब UK से आयी ,तो मुझे एक बात उसने UK लौटके बताई," मासी तुमसे अब सम्बन्ध रखना नही चाहतीं ...उनका कहना है,कि, वो अब किसी अन्य का तनाव बर्दाश्त करना नही चाहतीं"...
ये दोषारोपण मुझपे था...जबकि, इन पिछले दिनों, मेरे घरपे तुम्हारी और तुम्हारे परिवारकी एकही बार मुलाक़ात हुई थी...उस दिन मुझे बेहद सर दर्द था...और आँखों से बेसाख्ता आँसू बह रहे थे...वो वाक़ई मे शारीरिक तकलीफ से बहे आँसू थे...

"मैंने जब अपनी बिटियाके मूहसे ये बात सुनी, तो कुछ पल मुझे विश्वासही नही हुआ...! लेकिन ये सच था...तुमने मेरे सहज, हालचाल पूछ्नेके मक़सद से किए फोन्स काभी पलटके जवाब देना बंद कर दिया था...क्या ये वही तुम थीं, जिसकी खातिर मैंने, पूरे शेहेरको एकतरफ कर दिया था...जिसे , वो ग़लत होते हुएभी,मै पल,पल सहारा देती रही थी?..कभीभी अवहेलना नही की थी?..क्या तुम वहीँ थीं, जिसे अपनी दोस्तीपे हर दूसरे रिश्तेसे बढ़के नाज़ था?

बिटियाने मुझे ये बात फोनपे बताई..UK जानेके बाद...दिलपे क्या गुज़री उसका क्या बयाँ करूँ? नही करूँ,तो बेहतर...लेकिन मैंने एक sms तुम्हें भेज दिया...उसमे लिखा,' आजतक तुम्हें मेरी वजहसे जोभी मानसिक तनाव झेलने पड़े, उसकी तहे दिलसे क्षमा माँगती हूँ...तुमने जो मुझे सहारा दिया उसकी बेहद शुक्रगुजार हूँ..नही चाहती,कि, तुम्हारी ज़िन्दगीमे मेरे कारण तनाव महसूस हो...इसलिए, तुम्हारा हर contact नम्बर मैंने डिलीट कर दिया...उसी तरह, तुम मुझे,अपने जीवन से डिलीट कर दे सकती हो....मिटा सकती हो'...

पता नही,कि, मिटाया या नही...जानती, हूँ, फिलहाल, तुम्हारा जीवन फिर एकबार तेज़ रफ़्तार हो गया है...शायद, कभी किसी अकेले,एकांत पलमे मेरी याद आ जाय...! क्योंकि, मेरे हाथसे बनी चीज़ों से तुम्हारा घर भरा पडा है....या, तुमने, उन्हें भी हटा दिया, कह नही सकती....

"जब ये लिखा तो आँखें भर, भर आतीं रहीं.....२१ सालोंका साथ, सुख दुखका बँटवारा ...कम नही होता...टूटनेमे एक पल नही लगा..इस बातको २ माह्से अधिक समय हो गया...बोहोत कुछ खोया, उसमेसे ये भी एक बेहद बड़ा सदमा था...
तुमसे ऐसे जुदा होके लगता है, मेरी ज़िन्दगीका एक बेहद सुंदर अध्याह ख़त्म हो गया....खुश रहो सदा, यही दुआ देती हूँ..बोहोत कुछ पीछे छूट गया...जिसे सँजो के रखा था...हाथसे छिन गया....ज़िंदगी, जैसे,जैसे आगे बढ़ रही है, रिश्ते, दोस्तीके हाथ छुडा रहे हैं....

वो दिनभी यादों मे बसे हैं, जब तुम मुझसे दिनमे कमसे कम एकबार बात ना करलो,तुम्हें चैन नही आता था.....अब हरेक उस तनाव से, जो मेरे कारण तुम्हें हो सकता था, तुम आज़ाद हो..और इतने सदमे झेले उनमेसे येभी इक, यही तसल्ली कर लूँगी....
२८ मई थी, जिस दिन हम पहली बार मिले थे...तुम्हें,अब याद हो ना हो, वो दिन मेरे मनपे अंकित है.."

समाप्त

6 टिप्‍पणियां:

  1. कितने वेदना होती है इतने पुराने रिश्ते यूँ ही झटके में टूट जाने की..मगर किस किस बात पर हमारा वश चला है. इन्सान यादों के सहारे जीना सीख लेता है.

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  2. शमा जी,
    आपका संस्मरण अच्छा लगा...दोस्ती का कच्चा-पक्का रंग...

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  3. शमा जी,
    आपका संस्मरण अच्छा लगा...दोस्ती का कच्चा-पक्का रंग...

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  4. शमा जी
    बहुत दिन बाद इधर आ पाया । आपकी टिप्पणिया अच्छी लगती हैं । आपसे कोई अप्रसन्न हो नही सकता । इतनी सहजता और सरलता बड़ी तपस्या से मिलती है । आपके झूठ वाला संस्मरण रोचक भी है और प्रेरणास्पद भी ,हम भी खूब हँसे आपकी उस स्थिति की कल्पना करके । एक और पुरानी लिखी गजल आपको पढ़ते हुए याद आयी । शायद अच्छी लगे ।




    जख्म न छेड़े आँसू हैं बेताब छलकने लगते हैं

    सूखे फूल किताबों में ही रख्खे अच्छे लगते हैं



    दरिया ऐ गम इन आंखों से किसने बहते देखा है

    बड़ी उम्र वाले भी दुःख में मासूम से बच्चे लगते हैं



    वक्त नहीं मिलता यारों को जीवन के जंजालों से

    वे सच्चे होकर हंसते हैं तो कितने अच्छे लगते हैं



    नही चाहिए किसी की दौलत न कोई दे पाया है

    प्यार के दो बोल अय गर्दूं कितने मीठे लगते हैं



    बिना इबादत इमारतें सब मन्दिर मस्जिद गुरूद्वारे

    जिनको नूर ऐ खुदा मिला उनको सब एक ही लगते हैं

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  5. lekh achcha laga aapki bhaasha ki sehjata prashansiya hai

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  6. lekh achcha laga ,aapki bhasha ki sehjata prashansiya hai .

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